मेरी एकतीसवीं मौलिक पुस्तक, नया उपन्यास ‘रात, आपके शहर में’, आप पाठकों के हाथ में पहुँचाते हुए मैं आपसे कहना चाहूँगा कि कुछ कहानियाँ कभी पुरानी नहीं पड़ती। ‘ज़िंदगी जीरो माईल’, कहानी संग्रह की एक कहानी ‘शहर रात और आज की ये बारात’, 2010 के भी पहले लिखी गयी थी, प्लॉट तो खैर और पुराना था। इस कहानी का जो अंश छूट गया था, या जो आज का तात्कालिक रूप होना था, या जो सुधार होना था, लोकाचार को देखते हुए, मैंने सब कुछ करके आपके सामने एक साहित्यिक इकाई के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। आप इसे पढ़ें और ये सोचकर पढ़ें कि हमारे समाज में, हमारी दुनिया में, हमारे राष्ट्र में क्या किया जा चुका है और क्या करना अभी भी जरूरी है। मैं आपसे जरूर कहना चाहूँगा कि ये मेरी लिखी उत्कृष्ट कृतियों में से ही एक है। कुछ बेहद कठिन प्रश्न पूछे जाएंगे आपसे इस पुस्तक में। आपको जरूर लगेगा कि मैं पूरी पुस्तक में प्यास, पानी की तलाश और खुश होने के लिए बहाने और अवकाश की खोज में रह गया। मुझे, एक पूरी पुस्तक में कोई एक पात्र नहीं मिला जो कि इन कड़ियों को पूरी तरह पार कर पाया हो! भले ही हम लोकतन्त्र को व्यक्ति, परिवार,समाज और राष्ट्र के हर स्तर पर जीने का दंभ भरते हैं पर हम किसी एक स्तर पर भी इसके सात द्वारों में से एक द्वार भी पार नहीं कर पाते हैं। रचनाओं और मुझे प्यार दें, इसके अलावा तो कोई कीमत नहीं है, क्योंकि हर सेवा की कीमत नहीं ली जाती। कीमत एक ही बार विधाता अदा करेंगे!
हर्ष रंजन
ॐ नमः शिवाय! श्री हरि!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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