ये पुस्तक लिखते वक़्त मुझे ऐसा ही लग रहा था मानो मैं किसी अपनी ही उलझन को शब्द दे रहा हूँ। हम सभी अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी ये जरूर सोचते हैं कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं और फिर हम खुद को भी उन लोगों में से एक लोग बना देते हैं और अपनी सोच तक पर खुद से फुर्सत में विमर्श करते हैं। पाप और पुण्य, भला और बुरा, यश और अपयश और न जाने ऐसे कितने द्वंद चलते रहते हैं हमारे दिमाग में। इस उपन्यास के अंत तक मैं खुद ये कहने का साहस नहीं करता हूँ कि प्रभात को क्या माना जाये, एक देवता या एक कलंक... अंत में जब आप इस पुस्तक को बंद करते हैं तो यही ज्ञात होता है कि नजर भी नजरिए से हार जाती है। वस्तुस्थिति विचार से हार जाती है और जिसे घटने में युगों लगे वो सब कुछ इतने प्रक्रम और प्रक्रिया से गुजरकर भी सिर्फ और सिर्फ किसी एक की मान्यता की धार से हार जाती है।ये कहानी अभी और आगे बढ़नी है। इस विंदु पर इस कहानी को सालों पहले छोड़ा था और अब इसके दूसरे संस्करण के साथ, दूसरे भाग के लिए भी कुछ सोच रहा हूँ।
हर्ष रंजन
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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