हर लेखक अपने जीवन काल में कुछ न कुछ ऐसा जरूर लिखता है जो उसके लिए एक अनबीता लेकिन व्यतीत क्षण होते हैं! इसी तरह ये कहानी मेरी ज़िंदगी का अनबीता व्यतीत है! ये न गुजर कर भी गुजर चुका है, न घटकर भी घट चुका है! ये ज़िंदगी के वो पल हैं, जिनहोने आज के हर्ष रंजन को गढ़ा है, आज के इस लेखक की कलम को कागज और स्याही दी हैये कहानी आम है! आपने भी कहीं देखी-सुनी होगी! आज के युग में बहुत प्रांसंगिक है ये कथा और विशेष करके नयी पीढ़ी के लिए जो शौक, शरीर, संवेदना और संबंध के दायरे में अपनी समझ लिए जूझ रहे हैं! आप सब नयी पीढ़ी के दोस्तों को मैंने इस कथा को समर्पित किया हैमैं एक सनातनी और भारतीय नागरिक होने के नाते कभी नहीं चाहूँगा कि ये कहानी किसी भी ज़िंदगी में, किसी भी गली में, किसी भी शहर में दुहराई जाये। कितनी ही जिंदगियाँ भेंट चढ़ चुकी हैं इस यज्ञ की। अब सिर्फ इस दृष्टांत को पढ़ें और इसकी बारीकी समझें। अपनी तईस्वी किताब लोकार्पित कर रहा हूँ! प्रोत्साहन बनाए रखिए मेरे लिए भी और उन सारी पूजाओं के लिए, जो परायी दुनिया से अपने संसार में आने के लिए कष्ट झेल रही हैं और जाने-अंजाने अपनी दुनिया में, अपने घरौंदों के, सपने सँजो रही हैं!
हर्ष रंजन
नमस्कार,
मैं हर्ष रंजन अपनी रचनाओं के संसार में आपका स्वागत करता हूँ। मेरी कलम मेरे लिए मेरी आवाज, मेरे सपने, मेरी सच्चाई, मेरी गलतियां, मेरा हथियार और मेरे लिए दुनिया की सबसे पहली टाइम मशीन है। इन वाक्यों में मैं की जगह आप होंगे अगर आप इन किताबों के साथ कुछ कदम एक साथ चलने के लिए तैयार हैं। मेरी किताब न तो सर्कस है, न तो आपका ध्यान और आपके यत्न खींचने के लिए कोई व्यूह, न तो ये सत्संग हैं। ये एक बसा हुआ शहर है जहाँ हर एक परिच्छेद एक गली है और हर शब्द एक मकान। हर एक कविता, हर कहानी अपने आप में एक संसार है।
मैं आपको दिल की एक बात बताना चाहूंगा। मैंने हिंदी को उसकी शुरुआत और हिंदी के साहित्य को उसकी शुरुआत से जाना है। ये सफर बहुत रोचक है। कई प्रतिभा आयी और हिंदी को कुछ कदम और आगे बढ़ा गईं। मैंने अपने शब्दों का, अपनी शैली का आविष्कार नहीं किया, मैंने एक परंपरा को एक अनुज की तरह आगे बढ़ाया है। साहित्य के वर्णित विषय और साहित्य की शैली पुरानी हो सकती है पर समय का चक्र उन्हें फिर से उभार लाता है।
किताबें पढ़ें और अपने विचार जरूर बताएं।
आभार