महाशिवरात्रि के महा-पर्व पर सभी पाठकों को हर्ष रंजन, अर्थात मेरी ओर से अनेकानेक शुभकामनाएं। अपना नया कविता संग्रह, ‘शक्ति, एक रत्ती‘ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। कई लोग पूछते हैं कि जो बात सीधे तौर पर कही जा सकती है, उसे कविता से कहने पर क्या फायदा है? कवि किसी भी बात को बड़े हृदयस्पर्शी तरीके से कह सकता है, उसका प्रभाव बड़ा विकट होता है, ये तो आप सभी मानते हैं! इसके अलावा एक और बात है, कि कवि एक ही बात को इतनी बार, इतने नए तरीके से कहता है कि कहीं न कहीं सुनने वाला आत्मसमर्पण कर ही देता है। एक और बात, कवि बिना भींगे, मूसलाधार बारिश में भी पूरे शहर को कई बार घूम घूमकर भींगता देख लेता है। कवि होना ठाठ की बात है। चलिए, फिर एक पड़ाव के लिए आगे बढ़ता हूँ। आप इस पुस्तक को पढ़ें और सराहें, कुछ कहें, कुछ सुनें! कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:
रखवाले का भला है,
वो इंसान भविष्य पर चिंतित है कि
आज संडास के भीतर भी कला है!
कला बोई और उगाई जा रही है,
कला दाल-भात के साथ
खाई जा रही है,
कला ही सातों जन्मों का संबंध है,
दफ्तर से बिस्तर तक सिर्फ कला ही है
जिससे बिना शर्त निभाई जा रही है।
“ये ठीक है क्या?
कला देती है पर
क्या आप राजी हैं,
आज भीख है क्या?”
मुझे लगा कि कला वहीं है,
जहाँ इंसान हैं,
वो इंसान से नहीं,
इंसान उससे भाग्यवान है!
“कलाकार की एक अहर्ता है,
कला नाम का पंछी,
कब ठूँठ पर ठहरता है!”
उसे समझाऊँ कैसे कि
कला ही उसकी अहर्ता है!
कला जड़ से है न कि
फल जो पत्तों में फला करता है!
“हमने इतने फ़िल्टर लगाए,
ये…ये चुनकर आए!”
उसे मालूम है कि
उसके फ़िल्टर ने कला को कम
इंसानों को एक पैमाने पर
ही ज़्यादा छाना है!
उसे कला की गुणवत्ता नहीं,
परिमाण को निबटाना है!
उसका भी कहना सही है,
परिमाण की ही वैल्यू रही है!
कम मिले तो
लोग गोबर भी चाव से खाते हैं,
ज़्यादा मिले तो
खीर भी पिछवाड़े फेंक आते हैं!
तो तय हुआ कि
लोगों के हित है कि
लोगों को कम मिले,
जो भी मिले,
ऊँची दुकान पर ऊँचे दाम पर मिले,
अंधापन हो तभी प्रकाश की पहचान है,
ज़्यादा प्रकाश हो तो फिर,
वही अंधापन परिणाम है!
ॐ नमः शिवाय! श्री हरि!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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