सभी पाठकों को मेरा, हर्ष रंजन का पुनः एक बार नमस्कार! परछाईयों के पीछे सीरीज का पाँचवाँ भाग अब दूसरे संस्करण में आपके समक्ष है। कहानी थोड़ा और भी कुछ कहना चाहती थी, इसी बहाने मुझे भी एक नयी जिल्द तैयार करनी हुई। कहानियों का करवट बदलना और कहें तो करवट ही नहीं, इस बार तो लगभग एक ऐसी दिशा में जाना, जहाँ इसका प्रारब्ध है, सब इस भाग में दृष्टिगोचर होता है। कुछ अप्रत्याशित बातें हो जाती हैं, जो संभवतः लगा नहीं होगा कि पढ़नी पड़ेगी! जूझ रहे लोग और जूझ पड़ते हैं, जी रहे लोग और भी ज्यादा जिजीविषा प्रदर्शित करते हैं। जब हम लगातार असमतल भूमि पर चलते हैं तो कई बार पाते हैं कि पहाड़ भी ऊंचे हो गए हैं, खाइयाँ भी और गहरी हो गयी हैं। कुछ माँगा हुआ, कुछ दिया हुआ, कुछ लिया हुआ... बहुत कीमती सामान है! कुछ बड़े फैसले लिए गए, या लेने जाने हैं, जो लेने के लिए ही नहीं, कहें कि कह सकने के लिए भी संभवतः ही आसान हैं! बोझ बहुत है हर एक के माथे पर, इतने दबाब में, तनाव में, किसी के भी दैहिक/ मानसिक संतुलन बिगड़ जाने का खतरा होता हैं। बहरहाल! ये काले कागज़ आपको आगे ले जाएँगे! जब तक आप इसे पढ़ेंगे, इसका अंतिम भाग इति भी नए संस्करण के साथ आपके मोबाईल फोनों, टैब्स आदि पर आ चुका होगा। तो फिर मिलते हैं! पढ़ते रहें... पढ़ाते रहें... हँसते रहें... हँसाते रहें... और हाँ! प्रशंसा करें! वाह-वाही करें! कलाकार को ऊर्जा जठरानल से कम और प्रशंसा से ज्यादा मिलती है। कल्याण हो!
हर्ष रंजन।
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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