ये पुस्तक संक्षिप्त कहानी संग्रह मे संकलित एक कहानी का परिष्कृत रूप है। इसका एक अनुच्छेद प्रस्तुत है, आप इसके सहारे, इस कहानी का अंदाज़ लगा सकते हैं।
:: ...और सामने अम्मा बैठी हुई है जैसे किसी पुराने भव्य महल का शताब्दियों बाद जीर्ण शीर्ण खंडहर हो!
इस सबके अलावा और भी बहुत कुछ था जो मैं शायद बहुत छोटी हूँ व्यक्त करने के लिए बस मैंने पीछे मुड़कर देखा तो लगा कि पूरा गाँव, समाज मसान बन चुका है, जिस घर-आँगन खेली, जिस सड़क पर दौड़ी-भागी, जिस दुनिया में मेरा बचपन बसता था, वो पीछे धू-धू कर जल रहा है और मैं अपनी आँखें और आंचल बचाकर, उससे कतराकर बस निकल रही हूँ जैसे आज किसी से कोई मतलब न रहा, सब पराए हैं, जिनका दुख ही क्या और जिनका सुख ही क्या!
पापा ने कहा था इस खण्डहर से तुम्हारी विदाई हो रही है बेटा। तुम्हें महल के द्वारे तक छोडकर आया हूँ। माँ-बाप बेटी के आँसू का कारण न बने यही बेटी के माँ-बाप के जीवन की सार्थकता है।
आपकी गाड़ी की बेरहम रफ्तार मुझे खींचकर उस मोड़ पर ले गयी जहाँ से मेरी दुनिया नजर से ओझल हो गयी। मुझे बस इतना पता था कि मेरे पीछे वो दुनिया आज भी वहीं है जहाँ से निकल आने का आर्शीवाद मुझे सभी ने दिया था संभवतः इसी को विदाई कहते हैं।
ये कहानी एक लड़की के एक समुद्र लांघने की है, जो सिर्फ एक बार और एक तरफा ही हो सकती है। इस नयी दुनिया में, जब वो पुरानी दुनिया को याद करती है, तो एक ऐसा वर्णन भी सामने आता है। ये करुण हो सकता है पर दुखद कदापि नहीं। इस दूसरे संस्करण को पढिए और .... फिर मिलते हैं।
हर्ष रंजन।
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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