मेरी पहली प्रकाशित इस काव्य-कृति (2017-18) का दूसरा संस्करण ला रहा हूँ। इस ई-बुक में कुछ कविताओं का हेर-फेर हैं और कुछ नयी कवितायें भी जोड़ दी गयी हैं। इसका पेपरबॅक संस्करण भी उपलब्ध है जो Author's Ink Publication द्वारा प्रकाशित है लेकिन चूंकि आज की पीढ़ी का ज्यादा रुझान ईबुक्स की तरफ है, इसलिए पुरानी पुस्तक का नए परिवर्धित तरह से, नयी सेटिंग के साथ प्रकाशन आवश्यक था। इस संग्रह की कवितायें बीस वर्ष पुरानी तक हो सकती हैं और कुछ बीस घंटे पुरानी भीप्रयास कर रहा हूँ की पूर्व मुद्रित पुस्तकों का नया ईबुक संस्करण ला सकूँ कि उसमें समय के हिसाब से वांछित परिवर्तन किए जा सकें और नए रूप में उन्हें प्रस्तुत किया जा सके।
कुछ गुत्थियां उलझी रह गयीं,
कुछ पहेलियाँ अनसुलझी रह गयीं,
लोगों ने सवाल पूछना ज्यों बंद किया,
सवाल अनकहे हो गये,
नजरें झुकाने की लत लगी और
ज्वार अंदर खो गये...
बाकीं सब कुछ वहीं रहा!
हवाओं में उलझा आदमी एक
वहीं खड़ा रहा।
शब्दों के जाल में एक कबूतर
वहीं पड़ा रहा!
दो चक्कों को रोककर घोड़ा
वहीं अड़ा रहा।
उस पुराने कमरे को खोला,
कमरे में बंद अरमानों को टटोला
...एक आहट पास आ रही थी।
मैंने पाया
जिसे अंदर बंद किया था
लेकिन
परछाई उसकी
चौखट से दूर जा रही थी।
...और आज
पड़े-पड़े ये व्यथा जगी है
घर की दीवारें राख हो गयीं
और
हवा अब तक सर्द है
वो आग कौन सी लगी है?
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर्थन दीजिये।