हर्ष रंजन की ओर से आप सबको प्रणाम! हमने एक टर्म सुना होगा, तस्वीर में एक तस्वीर होती है, लेखक की अपनी जीवनानुभूति वही बड़ी तस्वीर है, जिसमें कहानी, कविताओं के रूप में कई छोटी-छोटी तस्वीरें होती हैं। सालों पहले जब मेरी पहली पुस्तक ‘एक आग का दरिया’ आई थी, तब मैंने अपने लेखन काल के उस को नामित किया था, ज़ीरो माईल शब्द से! लेखन का एक दौर, जीवन में एक सी अनुभूतियों के दौर के साथ खत्म हो जाता है। उस ज़ीरो माईल पर खड़े होकर मैंने बहुत सी पुस्तकें बाजार में उतारी। एक दौर तब खत्म सा हुआ प्रतीत हुआ जब परछाईयों के पीछे उपन्यास शृंखला का पटाक्षेप हो गया। इस पुस्तक का नाम मैंने लेखन के नए दौर के आधार पर रखा है, हाँ ठीक है कि इस संग्रह की एक अति-महत्वपूर्ण कविता का भी यही शीर्षक है पर जब लेखक का जीवन ही पुस्तक शृंखला हो जाता है तो फिर पुस्तकें और उसके शीर्षक लेखक के जीवन को कहीं ज्यादा व्यक्त करते हैं बनिस्पत पुस्तक को पुस्तक के रूप में व्यक्त करने से। मील दर मील सफर के बाद जो नजर आ रहा है, उसकी छवियाँ आपके सामने हैं। ये मेरी 44वीं मौलिक पुस्तक है। इसमें देश-दुनिया और समाज पर की गईं कई गम्भीर टिप्पणियाँ हैं। हाँ, ठीक है कि कविता संग्रह थोड़े समय के बाद आ रहा है पर भरपूर आ रहा है। कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत करके आप सब की शुभेच्छा के साथ अगली पुस्तक के लिए आगे बढ़ता हूँ। फिर मिलते हैं!
इच्छा तो थी
कहूँ यही तुमसे,
कि लौटकर नहीं आऊंगा।
कहूँ तुमसे कि मैं
न तो मौसम हूँ,
न तो सूर्य हूँ
और न तो कोई प्रेमी।
मैं एक इंसान हूँ,
मैं एक भिक्षुक संत हूँ,
मैं एक दौर
और उसका अंत हूँ।
मैं अपने पीछे एक
सन्नाटा छोड़ जाऊंगा,
मैं, तुम, तुम्हारे और हमारे
किसी के पाश में नहीं आऊंगा।
ये यकीन कि
जिंदगी चाहने वाले लोग
आपदाओं से डरते हैं
तुम्हे ये सच जानने नहीं देगा
कि हम और हमारे जैसे लोग,
जिंदगी की चाहत में
रोज कितनी बार मर सकते हैं।
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर बनाये रखिये।