मेरी प्रारम्भिक प्रकाशित काव्य-कृतियों में से एक और संग्रह, किस पार, का ये दूसरा संस्करण अब आपके समक्ष है। इसका प्रथम प्रकाशन Author's Ink Publication ने पहले 2018 में पेपरबैक के रूप में किया था। नए संस्करण की शृंखलाओं में जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, इस पुस्तक में भी एक अंश जोड़ा गया है। कुछ कवितायें नयी हैं। अपनी कुछ कृतियों को मैं कुछ वैसे ही देखता हूँ,जैसे कि कोई संग्रहालय को देखता है। कई कविताओं में पुराने कवि की छवि मिलती है तो स्वयं थोड़ा अलग सी अनुभूति होती है। एक कविता नीचे लिख रहा हूँ जो कि कम से कम तो, 2007 की तो जरूर है। जैसे तस्वीर किसी एक क्षण को विलक्षणता से चित्रित कर देती है, उसी तरह एक साहित्यिक इकाई, लेखक के मानस-पटल को विलक्षणता से शब्दों में खींच देती है। आपको ये शब्द लग सकते हैं पर जानने वालों को उसमें एक व्यक्तित्व और कृतित्व का आधार, उसकी बौद्धिकता के दर्शन हो जाते हैं। मुझे ये कुछ वैसी ही लगती हैं जैसे मेरे बचपन की तस्वीरें। मैंने इस दौर में जहाँ भी, जो भी पाया, बाहर भी और बाहर को अपने अंदर से भी, वो सब सीधे-सपाट व्यक्त कर दिया। बाहर का माहौल भी अलग था, भीतर की ग्रहण करने की शक्ति की अलग थी, नतीजतन कवितायें भी आज की अपेक्षा अलग लगेंगी। कुछ कवितायें राजनैतिक-वृतियों पर भी मिलेंगी, उस दौर में हो रही घटनाओं और चलन पर रोष भी मिलेगा, पश्चिमीकरण और परमुखापेक्षिता का विरोध भी मिलेगा! दुनिया तब से आज तक काफी बदल गयी है पर दुनिया कितनी ही बदल जाये, फिर कल उसे बदलना ही है, लोग भी उससे अपेक्षा यही करते हैं। उस दौर को याद करके, आज कुछ प्रसंगों पर संतोष है, कुछ पर आक्रोश है और कुछ पर स्वयं से विरोध है। अंततः, पुस्तक आपको अर्पित है! पढ़िये और अगली पुस्तक के नए संस्करण के लिए आज्ञा दीजिये, तब तक कल्याण हो।
हर्ष रंजन।
इस मौसम की आखिरी बहार !
तुम्हें हमारा
बहुत सारा प्यार !
पता है हमें,
इस आखिरी झड़ी ,
इस बौछार में,
निकल पड़ा है तुम्हारे मन का गुबार ।
....और इधर!
हमारे मन की तड़प,
हमारी प्यास,
जूझता,
जिंदगी और तुमपर हमारा विश्वास ,
सब सराबोर हैं आज ।
यहाँ मांगी गयीं ,दी गयीं,
अनकही माफियां ,
प्यार भरी घुड़कियां,
रह-रहकर चढता झुमार,
कुकुरमुत्तों से उग आए,
सपनों की कतार ,
सबके लिए तुम्हें धन्यवाद
और नमस्कार !
सब पर उपर अगली बार को ,
तुम्हें इसी मिलन की कसम रहेगी,
जिसके बूते पर,
अगले मौसम से
हमें बड़ी आशा रहेगी ।
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर बनाये रखिये।