होली के महत त्यौहार पर सभी पाठकों को अनेकानेक शुभकामनाएं। अपना नया पौराणिक उपन्यास, ‘द्रोण : प्रथम भाग (यथा ज्ञान)‘ आप पाठकों को अर्पित कर रहा हूँ। कभी के यू ट्यूब विडियो में कहा था कि सब कुछ लिखा जा चुका है...कहीं भी कुछ ऐसा नहीं है जो कि सिद्ध न किया जा सके। ये भी कहा था कि सही को गलत साबित करना बहुत आसान है पर गलत को सही साबित करने से ज्यादा आसान है, सही को सही साबित करना। पौराणिक इतिहास की भूमि में विरोधी विचारधाराओं द्वारा बनाए गए कुछ बंकरों को ध्वस्त करने के प्रयास में अब हमारे सामने था द्रोण प्रकरण। कथा बस उतनी ही है, सब कुछ लिखा और प्रकाशित किया जा चुका है। मैंने इन ऋषियों और अन्य पात्रों का मानवीय रूप और तदनुरूप नाटकीयता जोड़ दी है।
इस शृंखला के पहले भाग में द्रोण का आविर्भाव लिखित है। आप इस पुस्तक को पढ़ें और प्रतीक्षा करें कि अगला भाग शीघ्र ही आएगा!
हर्ष रंजन
ॐ नमः शिवाय! श्री हरि!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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