छठ महापर्व के शुभ अवसर पर सभी को हर्ष रंजन का नमस्कार। वैचारिक निबंधों की एक शृंखला लिखी है। सब कुछ तो लिख ही दिया है, और लिखना क्या? पूछा गया कि ऐसा नाम क्यों रखा संग्रह का…
अब इतना तो हम सब जानते हैं कि लड़ने-लड़ाने का षड्यंत्र चलता ही रहता है हमारे समाज में। इनको पता नहीं कि हमारी सनातन सभ्यता में लड़ने का कौशल पुराना है और पूर्ण विकसित भी है। कितने असुरों को ढेर किया है मातृशक्ति ने ये गिनना गिनतीतंत्र के लिए भी चुनौती है। तो फिर नयापन क्या था? नयापन था इसमें कि युद्ध के लिए दुश्मन किसे चिन्हित करवाये जाने का प्रयास था! इसी से छोर पकड़ में आया कि ये युद्ध धर्म प्रेरित नहीं बल्कि विभाजन की नीति थी। अगर सिस्टम ये समझता है कि राष्ट्र टूटे हुए, निराश्रित, अकेले बदहवास चलते जा रहे संवेदना-संवाद-सहयोगों से हीन, आत्मपीड़क इंसानों से बना समुच्चय भर है तो वो न भारत को जानता है, न भारतीयता को। जिस दिन राष्ट्र कमजोर होगा, उस दिन उस राष्ट्र के पीछे कमजोर हो चुका समाज मिलेगा, उस कमजोर हुए समाज के पीछे टूटा हुआ परिवार मिलेगा और टूटे हुए परिवार में कुछ खंडित व्यक्तित्व और कृतित्व वाले इंसान मिलेंगे। सिस्टम को चाहिए कि वो अपनी पूँजी खाने से बचे क्योंकि विशुद्ध भारतीय का विशुद्ध भारत के अलावा इस ग़ैर दुनिया में कोई सहारा नहीं है।
हर्ष रंजन
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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