मेरा दसवाँ कविता संग्रह, सरस्वती-पुत्र आप सभी पाठकों को अर्पित करते हुए आज संतोष है कि ज़िंदगी के बदलते हालातों में भी, आज इतने झंझावातों से घिरकर भी, जीकर भी चाहे जर्जर ही, विशुद्ध साहित्य से प्रेरणा पा रहा हूँ, हर तरफ़ बाज़ार से घिरा हूँ पर सेवा कर पा रहा हूँ। आज कविताओं का रूप जो होना था, वो कहीं तुकबंदियों में, गीत नाम की शाब्दिक चिंदियों में कहीं खो गया है! सर्जन की निरंतरता दूर हो गई है, एक सी ही पंक्तियाँ गायी और सालों तक दुहरायी जा रही हैं, ज़बरदस्ती कवित्व की ज़िद है, चुटकुले हास्य-व्यंग्य की कविताओं की जगह ले बैठे हैं! इतना समझ आया कि लोकप्रिय होना कविता नहीं करतब करने वालों के लिए ज़्यादा आसान है और इन्ही के बीच सरस्वती-पुत्र जैसी पुस्तक तैयार हुई, जो, इंतज़ार तुम्हारा, संग्रह के साल भर से भी ज़्यादा समय के बाद आयी है। ऑनलाइन मंचों पर ये कविताएँ नहीं मिलेंगी, अब करने से ज़्यादा दिखाने की प्रवृति से मैं भी बाज आ रहा हूँ! कवि का अंतर्मुखी होना ही ठीक है। कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ...
कला सबसे सुंदर होती है
पर ज़िंदगी कुरूप देती है,
वो प्रशंसा बन आनी थी,
पर बड़ी विद्रूप होती है।
सरस्वती के वीणा की तारों
के बेबस सुरीले तनाव में,
हंसो के विवेक में और
कलियुग के उससे दुराव में,
हमने पाया है वेद ऋचाओं को
ज्ञान और व्यावसायिकता के चुनाव में।
कला स्वर्ग सी हो चुकी है
जिसे जीते जी पा नहीं सकते,
मरकर जिसकी क़ीमत देनी हो,
उससे जी भी लगा नहीं सकते!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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