नमस्कार पाठकों। आपके नजरों की वृष्टि-छाया में पड़ा मेरा ये काव्य-संग्रह अब दूसरे संस्करण में आपकी दृष्टि में सहज ही आए, इस आशा के साथ, दर्जन भर से ज्यादा नयी कविताओं को भी आपको अर्पित कर रहा हूँ। 2018 में ये पुस्तक Author's Ink Publication ने पेपरबैक के रूप में निकाली थी और एक कामचलाऊ डिजिटल वर्जन भी अपलोड किया था। अब पुनः, प्रकाशन की बारीकियों को समझते हुए, मैंने, कृति और प्रस्तुति खुद की है। एक छोटा-सा नजरिया है! कभी अपने आस-पास की चीजों को ध्यान से देखिएगा! आपको इंसान दिखेंगे, जीव-निर्जीव सामान दिखेंगे! मुझे वो तो दिखते ही हैं पर साथ ही उनपर फैली, एक परत दिखती है, आसक्ति की! खैर! ये तब की बात थी, जब हर उस इंसान और सामान से कतरा-कतरा गिरती ये आसक्ति मुझे प्यास जगाकर, अपने पीछे भगाती थी, अब दूसरा संस्करण निकालते हुए लग रहा है, सब कुछ निचोड़ा जा चुका है! संभवतः काव्य-कर्म करने वाले सूखती आसक्ति से हारकर भक्ति की नमी में आराम पाते हैं! जैसा भी हो, आप बताएं कि इस नए काव्य-संग्रह से आप क्या नया पाते हैं? मिलता हूँ फिर! तब तक, कल्याण हो!
छोटे-छोटे शहरों में,
छोटी-छोटी गलियों,
चौराहों और हाटों में,
लोगों से हुई बातों में,
आकस्मिक मुलाकातों में
मुझे ज्ञात हुआ कि वो
शब्दों और समय के बहुत धनी हैं!
वहाँ हर चीज की हुआ करे पर
इनकी कहीं कमी नहीं है।
उस आदमी ने कहा कि
लोहे से सोना कमाया जाता है,
लोहा पीटकर सोना पहना जाता है।
ठीक लगता है क्या कि
शब्दों की कमी सरकारी दफ्तर में
और समय का अभाव कॉर्पोरेट रेस में
ज्यादा ही पाया जाता है!
उसने कहा, धन खर्च करने से ज्यादा
बचाने की माया है, ये क्या
कमाकर, बचाकर या खर्च करके भी
तुम्हें अब तक समझ नहीं आया है?
हर्ष रंजन।
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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