सावन की पहली सोमवारी के अवसर पर, मैं हर्ष रंजन, आपके समक्ष हूँ अपना पहला उपन्यास लेकर, जो कि उपन्यास शृंखला 'परछाईयों के पीछे' का पहला भाग है! इसे 'प्रारंभ' कहा है और ये पुस्तक दूसरा संस्करण है। ये कहानी कई बार लिखी और फाड़ी गयी थी। इस कहानी को पूरा करने के दौरान मुझ लेखक की आयु का इतना बड़ा हिस्सा निकल चुका था कि संभवतः ही आज कोई पाठक विश्वास कर सके कि क्या इतने दशकों तक कोई एक कहानी, किसी लेखक के दिमाग पर हावी या कम से कम प्रभावी रह सकती है! क्या लेखक इन विचारों और घटनाओं को आयु के साथ इतनी दूर भी ला सकता है! ये कहानी, 2009 में ही मानस-पटल पर खींची जा चुकी थी। इस शृंखला को मैंने 2025 तक कागज़ पर खींचा। इस दौरान 16 साल गुजर गए! कई बार लगा कि मेरा लेखन खत्म हो जाएगा, कई बार लगा कि मैं ही खत्म हो जाऊंगा, कई बार लगा कि दुनिया ही खत्म हो जाएगी! लेकिन हम सब आज भी हैं, इस कहानी को पढ़ने के लिए! इतने समय में एक बच्चा बड़ा हो जाता है और उसी तरह एक वयस्क और भी अनुभवी हो जाता है। ये कहानी भी बड़ी होते-होते, बहुत बड़ी हो गयी। खुद मैंने इस कहानी को परखने में दो बार चूक की है। प्रारंभ, विस्तार, पड़ाव और पूर्व-संध्या की तो छोड़िए, मुझे लगा था कि संध्या ही अंतिम होगी पर बात इति तक जानी ही थी। मैंने कुछ नया नहीं जोड़ा, कोई नयी सहायक कहानी नहीं डाली! प्रथम दिन से इस कहानी का थीम यही था, इस कहानी में मुझे इतना ही कहना था पर वाक्य और अध्याय जुडते चले गए। इस कहानी का एक छोटा सा स्क्रीनशॉट आपने मेरे कहानी संग्रह, 'संक्षिप्त' की कहानी, 'चेहरे' में पाया होगा! 'चेहरे', ही इस हजारों पन्नों के सफर की प्रेरणा थी। लेखक की कहानी पर मत जाइए, लेखक की कहानी पर जाइए, जो अब आपके सामने है। लोगों को प्रेम में बड़ी रुचि है, बड़ी उत्कंठा है, बड़ी जिज्ञासा है! मैंने यहाँ इतने रूप दिखा दिये हैं कि आजकल किचन की खिड़की से लेकर रेलगाड़ी की खिड़की तक में प्यार की तलाश में लगी पीढ़ी को कुछ अनुमान हो सके कि प्रेम कहानियाँ क्या होती हैं! फिर मिलता हूँ! कल्याण हो!
हर्ष रंजन।
ॐ नमः शिवाय! श्री हरि!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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