Parchhaiyon Ke Peechhe

· Parchhaiyon Ke Peechhe Issue #6 · Harsh Ranjan
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ॐ नमः शिवाय!

फिर से हर्ष रंजन का नमस्कार पाठकों! परछाईयों के पीछे शृंखला का अंतिम भाग आपके सामने है। इसमें कुछ घटनाएँ हैं, कुछ सीखें हैं और फिर एक खामोशी छा जाती है। कहते हैं कि परिपक्वता आदमी को चुप करा देती है। कहानी कम बची थी और अनुभूतियाँ ज्यादा, और अनुभूतियों पर ही कहानी का अंत हो जाता है। कई प्रेमकहानियाँ कही गयी हैं! सब को कोई न कोई परिणाम मिला। कहानियाँ खत्म नहीं होती... कभी पात्र बदलते हैं, कभी लेखक का फोकस बदलता है। कलम विश्राम के लिए एक जगह रूक जाती है और पाठक को लगता है लेखक अपनी कहकर, अपना बोरिया-बिस्तर लेकर निकल गया। कहानी से फिर कोई कहानी निकल जाएगी पर इस भाग का नाम सबकी सहमति (जो हैं) और जो नहीं हैं उनकी अधूरी इच्छाओं के नाम पर, इति ही रहेगा। ये एक दौर खत्म कर रहा हूँ फिर से। इस दौर में मेरी कलम और मेरे मन में जो बचा था वो सब कागज़ पर आ चुका है। अब नया दौर क्या लाता है, ये बात विधाता कभी नहीं बताता है। अब थोड़ा और गहरा जाने की इच्छा है, यहाँ दो कलमकार दफन हैं। 

अब चूँकि, सच्चाई को शब्दों का शृंगार करते-करते इतना माहिर हो गया हूँ कि उन दोनों का जीना, मरना और फिर कागज़ पर जी उठना, चाहे जितना भी तिरस्कृत रहा हो, उसे भी खूबसूरत और कथनीय/पठनीय बना सकता हूँ। इन दोनों ने भी बहुत जिया था... विश्वास कीजिये! बहुत!

कभी-कभी अलमारी के किसी कोने से, दिमाग में बुने हुए नसों के जाल से, निकलकर,ये दोनों लेखक मुझसे आरजू-मिन्नत करते हैं! इनके साथ भी न्याय जरूरी है। 

लेकिन आगे भी नयी भूमिकाएँ हैं, नए कागज़ हैं, कलम हैं, लिखने की प्रेरणा है, कलम के साथ खड़े होने का दम-खम है! कभी-कभी अपने गुरु जी की बात याद आती है, कहा था उन्होने कि समय कम है और लिखना ज्यादा है! एक लिहाज से सही ही है कि काम ज्यादा हो तो समय खुद ही कम हो जाता है और अपन के साथ तो वैसे ही…

आप इस भाग को पढ़ें और मुझे अनुमति दें... ये दूसरा संस्करण और पूरी की पूरी परछाईयों के पीछे उपन्यास शृंखला इसके साथ, इस परिपेक्ष्य में, पटाक्षेप लेती है। 

... मैं भी देखूँ! अब कौन सी कहानी बुला रही है... होनी अगला कौन सा मैराथन दौड़ा रही है? तक तक कल्याण हो!

                                                         हर्ष रंजन।

ॐ नमः शिवाय! फिर से हर्ष रंजन का नमस्कार पाठकों! परछाईयों के पीछे शृंखला का अंतिम भाग आपके सामने है। इसमें कुछ घटनाएँ हैं, कुछ सीखें हैं और फिर एक खामोशी छा जाती है। कहते हैं कि परिपक्वता आदमी को चुप करा देती है। कहानी कम बची थी और अनुभूतियाँ ज्यादा, और अनुभूतियों पर ही कहानी का अंत हो जाता है। क...

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About the author

नमस्कार,

हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।

लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।

ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।

कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।

ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।

कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!

विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर्थन दीजिये।

नमस्कार, हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और...

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