Vairagya

· Harsh Ranjan
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ॐ नमः शिवाय!


हर्ष रंजन की तरफ से आप सब को एक बार फिर प्रणाम! 'वैराग्य' कहानी संग्रह का दूसरा, विस्तृत/परिवर्धित संस्करण अब आपके सामने है। इस संग्रह में कई कहानियाँ जोड़ी गयी हैं। पिछली बार, ये संग्रह बड़े नैराश्य के माहौल में निकाला गया था। पिछले संस्करण की प्रस्तावना में आपने पढ़ा ही होगा कि कहानियों की तरफ मेरी दृष्टि थोड़ी वक्र सी हो गयी थी। लगातार उपन्यास लिखने के कारण ऐसा हो जाता है। उपन्यास जितनी परीक्षा है, उतनी ही सुविधा भी है लेखक के लिए। कहानी में जो आपको सुविधा दिख रही है, वो वस्तुतः स्वयं ही परीक्षा है। हालांकि कहानियाँ कई तरह की हुआ करती हैं। उदाहरणस्वरूप तस्वीर सी! किसी बड़ी गाथा का एक अंश भर! औचक ही अनुभव किया गया और औचक ही कह दिया गया, आदि-आदि। किन्तु अब समझ में आता है कि हर कहानी उपन्यास नहीं बन सकती और हर उपन्यास को तोड़कर कुछ या कई कहानियाँ नहीं बनाया जा सकता। अगर ऐसा किया भी गया तो न केवल अप्राकृतिक है अपितु लेखक को अतिशय थकावट भी होगी। कुछ अनुभूतियाँ जो सिर्फ कहानी ही बन सकती हैं, वो इसमें पहले से थीं, कुछ और मैंने जोड़ दी। एक क्षण के लिए लगा था कि अब बस! अब कहानियाँ नहीं! लेकिन इस संग्रह में अब जोड़ी गयी कहानियों को लिखकर लगा कि नहीं! कहानीकार के रूप में और ज्यादा, इस पड़ाव पर ठहरना, एक लेखक के रूप में, मेरे लिए शुभ नहीं होगा। ऐसा भी नहीं है कि कहानियाँ अर्थ के परिपेक्ष्य में हल्की होती हैं! हाँ! बशर्ते उन्हें हल्के तौर पर न लिया जाये! 'दौर था, गुजर गया', के बाद जो बड़ा अंतराल आया, उसमें बीसियों कहानियाँ मेरे मानसपटल पर बिजली सी चमकी और गुम भी हुईं। इस समय लंबे, शृंखलों में निकलने वाले, उपन्यासों में उलझे रहने के कारण मैंने उनके पीछे दौड़ने से भी परहेज किया। अब भी अफसोस है! क्योंकि आयु कभी घटनाओं और अनुभूतियों से खाली नहीं रहती। लेकिन एक बात ध्यान देने की है कि पिछले बार की तरह इस बार भी, जब जीवन में नए दौर आते हैं तो उनकी अनुभूतियाँ आदतवश मेरे हाथ से कहानियाँ बनकर ही निकलती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा था, पिता बनने के बाद मेरे जीवन में जो नया दौर आया, वो कहानियाँ बनकर निकला है।

उपन्यास की प्रशंसा गाना लाजिमी भी है पर हल्की-फुल्की कहानियों की छोटी कारों और छोटे शहरों की छोटी सड़कों पर उनके सफर भी यादगार होते हैं। नयी कहानियों के साथ, आप और भी परिपूर्णता से इस यात्रा का आनंद लीजिये। जैसे भारत वेदों-पुराणों की ओर लौट रहा है, मैं भी दस कहानियों के संग्रह की ओर लौटकर आया हूँ। कुल दस! पक्का हिसाब! इस पुस्तक का आस्वादन कीजिये और मुझे अगली पुस्तक के लिए आज्ञा दीजिये! कल्याण हो!

हर्ष रंजन।        

ॐ नमः शिवाय! हर्ष रंजन की तरफ से आप सब को एक बार फिर प्रणाम! 'वैराग्य' कहानी संग्रह का दूसरा, विस्तृत/परिवर्धित संस्करण अब आपके सामने है। इस संग्रह में कई कहानियाँ जोड़ी गयी हैं। पिछली बार, ये संग्रह बड़े नैराश्य के माहौल में निकाला गया था। पिछले संस्करण की प्रस्तावना में आपने पढ़ा ही होगा कि कहान...

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Ratings and reviews

6 reviews
Ravi Agrawal
March 11, 2025
Very Great work. Classic. Congratulations!!!...... 👏
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Arjun Dangi
April 8, 2026
👍👍
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About the author

नमस्कार,

हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।

लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।

ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।

कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।

ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।

कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!

विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर्थन दीजिये।

नमस्कार, हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और...

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