Ahalya (Yatha Gyan)

· Harsh Ranjan
4 reviews
Ebook
146
Pages

About this ebook

अहल्या की ये कथा आज भी प्रासंगिक है क्योंकि आज भी कई भोगवादी शक्तियाँ, कई ईर्ष्यालु और कई अतृप्त शक्तियाँ हमारे परिवार की कन्याओं को साम, दाम, दंड, भेद आदि के प्रयोगों से पतित करने का प्रयास करते हैं और छोटी सी गलती के बाद उन्हें पतन के ऐसे दलदल में गिराते हैं कि कोई समाधान नहीं बचता। फिर लंबे पश्चाताप और प्रायश्चित, अनेकानेक दुख और कष्ट और योजनों तक फैले नर्क सा जीवन, शाप और उद्धार! दुखद कथाएँ जो अंत में उसी दिव्य शक्ति से मिलाती हैं जिनसे हम निष्पाप होकर कहीं अधिक सरलता से मिल सकते थे। कुछ कुतर्कों और थोड़ी सी नासमझी के पीछे ये अथाह दुख क्यों भोगना? ये सत्य हम सब को समझना होगा।
अहल्या की ये कथा आज भी प्रासंगिक है क्योंकि आज भी कई भोगवादी शक्तियाँ, कई ईर्ष्यालु और कई अतृप्त शक्तियाँ हमारे परिवार की कन्याओं को साम, दाम, दंड, भेद आदि के प्रयोगों से पतित करने का प्रयास करते हैं और छोटी सी गलती के बाद उन्हें पतन के ऐसे दलदल में गिराते हैं कि कोई समाधान नहीं बचता। फिर लंबे पश...

Discover more

Ratings and reviews

4 reviews
MANJU KUMARI
December 9, 2025
नमस्ते ! हर्ष रंजन जी हमें उम्मीद है कि अच्छे होंगे। वैसे हमारा नाम मंजु है और हमें न कहानियां पढ़ना काफी पसंद है। हमने आपकी ऑनलाइन फ्री वाली बहुत सी कहानियों को पढ़ चुकी हूं और अब तक हमने जितने भी पढ़े वो सभी बहुत अच्छे थे । लेकिन अभी -अभी जिस पुस्तक को हमने पढ़ा है -'अहल्या' पहले पढ़े उन सभी काफी हद तक बेहतर है या यूं कहूं कि सबसे अच्छा है। 'अहल्या' में आपने जिस प्रकार के भाषा का चयन किया है वो शीर्षक के अनुसार बिलकुल सही है । भाषा की यही खासियत 'अहल्या' कोखास बनाती है हमें ये पुस्तक सबमें काफी पसंद है ऐसी रचनाओ के आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
Did you find this helpful?
Ravi Agrawal
October 3, 2025
very great, classic book. very inspiring, insightful. Giving warning to society.
Did you find this helpful?
Daulat Birajdar
October 3, 2025
so happy
Did you find this helpful?

About the author

नमस्कार,

हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।

लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।

ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।

कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।

ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।

कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!

विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर्थन दीजिये।

नमस्कार, हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और...

Rate this ebook

Tell us what you think.

Reading information

Smartphones and tablets
Install the Google Play Books app for Android and iPad/iPhone. It syncs automatically with your account and allows you to read online or offline wherever you are.
Laptops and computers
You can listen to audiobooks purchased on Google Play using your computer's web browser.
eReaders and other devices
To read on e-ink devices like Kobo eReaders, you'll need to download a file and transfer it to your device. Follow the detailed Help Center instructions to transfer the files to supported eReaders.