श्री कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर पाठकों को मेरी, हर्ष रंजन की तरफ से हार्दिक शुभकामनायें! मेरा ये कविता-संग्रह, आषाढ़ की दुपहरी, दूसरे संस्करण में, आपके समक्ष है। आषाढ़ बड़ा चर्चित मास है हमारे पंचांग में। इस के अतिरिक्त इसे कवि-कुलगुरु कालिदास से जोड़कर देखा जाता है। संग्रह में उनका उल्लेख हो गया, संग्रह क्या, कवि का जन्म सफल हो गया। सावन की पदचाप आपको जिन बातों का स्मरण दिलाती है, वो है, महीनों की लंबी प्यास और आगे सब हरा-हरा होगा, इसका उल्लास! जब ये दोनों बातें आपस में मिलते हैं तो आषाढ़ वाली स्थिति जो जाती है, करुणा का जग जाना अपरिहार्य है। पर्वत के शिखर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, इस संग्रह की एक नयी कविता में जो पर्वत-शीर्ष हैं, वो थोड़े अलग हैं! वो कहने को दंड नहीं हैं, पाखंड हैं... हमने पाया है कि जब आपके अंतर में कुछ और हो, बाहर कुछ और हो, तो इस अवस्था में स्वेच्छा से बने रहना, पाखंड है। लेकिन ये हर बार अशुभ नहीं है। रोग वांछित नहीं है, उपचार वांछित है। उपचार निष्फल हो जाये तो फिर भी वो अवांछित नहीं कहलाएगा! एक और बात है कि रोगी को धैर्य दिलाना भी उपचार है, वो भी कदापि अवांछित नहीं है। इसका अर्थ है कि सब जरूरी है जबकि चहुओर कोई न कोई मजबूरी है।
एक कविता की पंक्तियाँ नीचे पढ़िये और कविताओं का नए कलेवर में आनंद लीजिये। एक प्रॉडक्ट को लॉंच करना, री-लॉंच करना, री-री लॉंच करना, ये तो देश में दशकों से चला आ रहा है, तो हम ही क्यों पीछे रहें... हाँ किन्तु हमारे लॉंच और हमारे लंच में कोई संबंध नहीं है, इतना तो जरूर है। साहित्य बाहर आए और, और प्रभावी ढंग से बाहर आए, हमारा बस इतना प्रयत्न है! तब तक कल्याण हो!
ख्वाब आँखों में लिये
एक लडका चौराहे पर खडा है....
कोई कानों में धीरे से कहता है
तुम अकेले हो जो
मौतों के बीच भी मगन रहता है।
आज हर तरफ मुर्दा ख्वाहिशें बिकती हैं।
ये जिंदगी की तस्वीरें हैं
मेरी सूनी दीवार पर ऐसी ही दिखती हैं।
मैंने बहुत कुछ खोया है
नियति के पदचिह्नों पर
बेबस नारायण भी रोया है।
वो लडका सिर झुकाए आगे बढ जाता है,
घुटनों के दर्द से कराहता है
एक आरंभ से परेशान है
एक इति चाहता है, पर
वो आज भी एक पुराना वादा,
एक पुराना रिश्ता निबाहता है।
हर्षी पढ़ें।
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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