हर्ष रंजन की तरफ से सभी पाठकों को प्रणाम! आपके समक्ष एक कहानी संग्रह ही नहीं, एक दौर है, शीर्षक है, 'दौर था, गुजर गया।' जब छापने की बारी आई, तो मैंने बस बंदर-बाँट सी की थी। आज स्वीकार कर ही लेता हूँ। सिर्फ 'संक्षिप्त' ही ऐसा संग्रह था, जिसमें कहानियाँ मैंने सोच-समझ कर रखी थीं। कह ही देता हूँ कि,'दौर था, गुजर गया' संग्रह के हिस्से बची-खुची कहानियाँ आयीं... बिलकुल हल्की-फुलकी!आपको यहाँ 2010 के आस-पास की कहानियाँ मिल जाएँगी। फिर यही संग्रह, बहुत से फेर-बदल (यहाँ तक कि नाम भी!) के साथ कागज़ पर छपा। किन्तु मैंने इसको इसी रूप में बनाए रखा। आज भी जब ये संग्रह कभी खुद देखता हूँ तो पुरानी कलमें और उनकी उगली हुई स्याही के दाग उसमें दीख जाते हैं। इस संग्रह में दो कहानीकार दफन हुए थे, एक आनंद और दूसरा राजहंस! इनहोने अपने पीछे जो अलमारियाँ छोड़ी हैं, उनमें अभी भी कम से कम चालीस किताबों का माल है! चलिये, यहीं पर इस भूमिका को विराम देता हूँ और आपको इस पुस्तक के साथ थोड़ा मुस्कुराने और थोड़ा लेखक और लेखन के अतीत में गुम जाने छोडता हूँ।
हर्ष रंजन।
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