यह एक लम्बी कथा है जिसका केवल एक अंश— कैलास पर वसंत के अकस्मात आविर्भाव से लेकर काम के भस्म होने और तद्नंतर रति के विलाप की प्रतिक्रिया में मनुष्य मात्र को आश्वस्त करने वाली आकाशवाणी तक—यही ‘भस्मांकुर’ की विषयवस्तु है।
इतनी-सी कथा को इस काव्य के केंद्र में रखकर नागार्जुन ने अपनी लोकदृष्टि, गहन सामाजिक सम्पृक्ति और उदात्त आशाबोध के साथ बड़े और व्यापक अर्थों में पाठक तक पहुँचाया है।
काम के पुनरुद्भव, उसके भस्म से अंकुरित होने को उन्होंने मानव-जीवन के सातत्य से जोड़ा है। यह काम ही है जो सृष्टि का, जिजीविषा का और कामना का मूल है। बरवै छंद में एक हजार पंक्तियों में अनुस्यूत यह रचना नागार्जुन की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है।