Kahi Isuri Faag

· Rajkamal Prakashan
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339
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ऋतु डॉक्टर नहीं बन पाई क्योंकि रिसर्च गाइड प्राध्यापक प्रवर पी.के. पांडेय की दृष्टि में ऋतु ने ईसुरी पर जो कुछ लिखा था, वह न शास्त्र-सम्मत था, न शोध-अनुसन्धान की जरूरतें पूरी करता था। वह शुद्ध बकवास था क्योंकि ‘लोक’ था। ‘लोक’ में भी कोई एक गाइड नहीं होता। लोक उस बीहड़ जंगल की तरह होता है जहाँ अनेक गाइड होते हैंदृजो जहाँ तक का रास्ता बता दे वही गाइड बन जाता हैदृकभी-कभी तो कोई विशेष पेड़, कुआँ या खंडहर ही गाइड का रूप ले लेते हैं। ऋतु भी ईसुरी-रजऊ की प्रेम-कथा के ऐसे ही बीहड़ों के सम्मोहन की शिकार है। बड़ा खतरनाक होता है जंगलों, पहाड़ों और समुद्र का आदिम सम्मोहन...हम बार-बार उधर भागते हैं किसी अज्ञात के ‘दर्शन’ के लिए...‘कही ईसुरी फाग’ भी ऋतु के ऐसे ही भटकावों की दुस्साहसिक कहानी है। शास्त्रीय भाषा में ईसुरी शुद्ध ‘लम्पट’ कवि हैदृउसकी अधिकांश फागें एक पुरुष द्वारा स्त्री को दिए शारीरिक आमन्त्रणों का उत्सवीकरण है। जिनमें शृंगार काव्य की कोई मर्यादा भी नहीं है। इस उपन्यास का नायक ईसुरी है, मगर कहानी रजऊ की हैदृप्यार की रासायनिक प्रक्रियाओं की कहानी जहाँ ईसुरी और रजऊ दोनों के रास्ते बिल्कुल विपरीत दिशाओं को जाते हैं। प्यार बल देता है तो तोड़ता भी है... सिद्ध संगीतकार कविता की किसी एक पंक्ति को सिर्फ अपना प्रस्थान-बिन्दु बनाता हैदृबाकी ठाठ और विस्तार उसका अपना होता है। बाजूबंद खुल-खुल जाए में न बाजूबंद रात-भर खुल पाता है, न कविता आगे बढ़ पाती है क्योंकि कविता की पंक्ति के बाद सुर-साधक की यात्रा अपने संसार की ऊँचाइयों और गहराइयों के अर्थ तलाश करने लगती है। मैत्रेयी पुष्पा की यह कहानी उसी आधार का कथा-विस्तार हैदृशास्त्रीय दृष्टि के खिलाफ़ अवैध लोक का जयगान।
ऋतु डॉक्टर नहीं बन पाई क्योंकि रिसर्च गाइड प्राध्यापक प्रवर पी.के. पांडेय की दृष्टि में ऋतु ने ईसुरी पर जो कुछ लिखा था, वह न शास्त्र-सम्मत था, न शोध-अनुसन्धान की जरूरतें पूरी करता था। वह शुद्ध बकवास था क्योंकि ‘लोक’ था। ‘लोक’ में भी कोई एक गाइड नहीं होता। लोक उस बीहड़ जंगल की तरह होता है जहाँ अनेक...

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About the author

जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमनियाँ तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, अगनपाखी, विजन, कही ईसुरी फाग, त्रिया हठ, गुनाह-बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); कस्तूरी कुंडल बसै, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा); खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज)। फैसला कहानी पर टेलीफिल्म वसुमती की चिट्ठी। प्रमुख सम्मान : सार्क लिट्रेरी अवार्ड, 'द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायती राज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, प्रेमचन्द सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान, शाश्वती सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान। सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप। सम्पर्क : 104, महागुन मार्फियस, प्लाट नं. ई-4, सेक्टर 50, नोएडा-201303 (उ.प्र.)। मोबाइल : 09910412680
जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमनियाँ तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा ब...

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