Jhoola Nat

· Rajkamal Prakashan
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गाँव की साधारण–सी औरत है शीलोµन बहुत सुंदर और न बहुत सुघड़–––लगभग अनपढ़µन उसने मनोविज्ञान पढ़ा है, न समाजशास्त्र जानती है । राजनीति और स्त्री–विमर्श की भाषा का भी उसे पता नहीं है । पति उसकी छाया से भागता है । मगर तिरस्कार, अपमान और उपेक्षा की यह मार न शीलो को कुएँ–बावड़ी की ओर धकेलती है, और न आग लगाकर छुटकारा पाने की ओर । वशीकरण के सारे तीर–तरकश टूट जाने के बाद उसके पास रह जाता है जीने का नि:शब्द संकल्प और श्रम की ताकत एक अडिग धैर्य और स्त्री होने की जिजीविषा–––उसे लगता है कि उसके हाथ की छठी अंगुली ही उसका भाग्य लिख रही है–––और उसे ही बदलना होगा । झूला नट की शीलो हिंदी उपन्यास के कुछ न भूले जा सकने वाले चरित्रों में एक है । बेहद आत्मीय, पारिवारिक सहजता के साथ मैत्रेयी ने इस जटिल कहानी की नायिका शीलो और उसकी ‘स्त्री–शक्ति’ को फोकस किया है––– पता नहीं झूला नट शीलो की कहानी है या बालकिशन की ! हाँ, अंत तक, प्रकृति और पुरुष की यह ‘लीला’ एक अप्रत्याशित उदात्त अर्थ में जरूर उद्भासित होने लगती है । निश्चय ही झूला नट हिंदी का एक विशिष्ट लघु–उपन्यास है–––
गाँव की साधारण–सी औरत है शीलोµन बहुत सुंदर और न बहुत सुघड़–––लगभग अनपढ़µन उसने मनोविज्ञान पढ़ा है, न समाजशास्त्र जानती है । राजनीति और स्त्री–विमर्श की भाषा का भी उसे पता नहीं है । पति उसकी छाया से भागता है । मगर तिरस्कार, अपमान और उपेक्षा की यह मार न शीलो को कुएँ–बावड़ी की ओर धकेलती है, और न आग लगाक...

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2 reviews
J P Mishra
August 5, 2023
कहानी का परिवेश समाज का मूल आधार है और इसका नायक समाज का आम आदमी, जो नितांत अकेला अपने स्वाभाविक अंतर्द्वंदों में लिपटा समाज की दुर्व्यवस्था और भाग्य की लकीरों से जूझ रहा है, कथाकार उसके भीतर अपनी उपस्थिति दर्शाने में काफी कुछ सफल रहा है। समाज का ताना-बाना, अंतर्संबंध, अवस्थाओं के आरोह-अवरोह के बीच चेतना का सतत ज्योतिर्मय प्रकाश झलकता रहता है। नारी और पुरुष के निरंतर बदलते रूप, जो समय की कला उन्हें अनचाहे ही सौपती रहती है कथा में सर्वत्र व्याप्त है। समस्याएं किसी भी वर्ग की हों, कैसी भी हों, उसके लिए वही महत्वपूर्ण होती हैं, यह कथन की जीवन की असफलता का दंश जीवन की कमजोर स्थिति में बार बार दुख देता है, अच्छा लगा। एक सामान्य रहन सहन में कितने जाने अंजाने संसार बसते हैं, जितने लोग उतने संसार एक साथ समाज में एकसाथ चलते है। यद्यपि की सभी अपने संदर्भ में उपयुक्त और न्यायपूर्ण होते हुए भी एकदूसरे के लिए डरावने, भयावह और प्रिय भी होते हैं। कथाकार सामाजिक सदर्भो में मानव समस्याओं को प्रकाशित करने में सफल रहा है। यद्यपि मात्र आंतरिक स्वाद उत्पन्न करने की दृष्टि से कुछ वर्णन को छोड़ा जा सकता था।
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About the author

जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमनियाँ तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, अगनपाखी, विजन, कही ईसुरी फाग, त्रिया हठ, गुनाह-बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); कस्तूरी कुंडल बसै, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा); खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज)। फैसला कहानी पर टेलीफिल्म वसुमती की चिट्ठी। प्रमुख सम्मान : सार्क लिट्रेरी अवार्ड, 'द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायती राज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, प्रेमचन्द सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान, शाश्वती सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान। सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप। सम्पर्क : 104, महागुन मार्फियस, प्लाट नं. ई-4, सेक्टर 50, नोएडा-201303 (उ.प्र.)। मोबाइल : 09910412680
जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमनियाँ तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा ब...

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