नमस्कार! हर्ष रंजन की तरफ से आप सभी का अभिवादन! अब 'परछाईयों के पीछे' उपन्यास शृंखला के तीसरे भाग, 'पड़ाव' के साथ आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ। यहाँ उपन्यास के पात्रों के थोड़ा ठहराव लिया था, सबने बहुत यात्राएं कर ली थीं। खुद लेखक, अर्थात मैंने, पहले दो भागों के बाद इस भाग तक आने में बहुत विश्राम किया था। आज भी याद है कि सत्तर से अस्सी पन्नों को रंगकर, मैंने कई काम किए, कई सपने देखे और एक महत अल्प-विराम लिया।
जब मैं यहाँ से उठकर खड़ा हुआ तो लगा कि ये कहानी, अपनी मुझसे काफी मेहनत करवाने वाली है।
रवि ने अपना सफर प्रारम्भ किया और पाया कि इस नभ का विस्तार कितना है! अब उसने थकावट से घिरे हुए, एक पड़ाव लिया... बाह्य! उसका अंतर अभी भी गतिमान था। ये वही पड़ाव है। यहाँ से न केवल पात्रों को बदल जाना था, किताब का हल्का-फुलकापन बदल जाना था, दैव ने तय किया था कि यहाँ के लेखक और लेखक का लेखन, उसे साधन, साध्य, साधना का स्वरूप और साधना-स्थली के साथ साधना की शक्ति में भी बदलाव आना था।
ये पड़ाव कुछ ज्यादा ही करूण, कुछ ज्यादा ही दारुण हो गया... फिर तो कहीं कोई संभावना ही नहीं बची।
कभी-कभी, किसी चीज को, किसी इंसान को, हम सामीप्य होने पर समझ पाते हैं! कभी-कभी हम उस सामीप्य में खो जाते हैं और कभी-कभी हम सामीप्य के कारण, संतोष और तृप्ति की नींद सो जाते हैं। कई बार भगवान हमें, उस सामीप्य को भंग करते हैं और हमें ये बताते है कि हम क्या हैं उस विषय के लिए, वो विषय क्या है, हमारे लिए और हम दोनों का समीकरण क्या है, हमारे और संसार के लिए। इस दूरी के बाद लोग उससे कहीं ज्यादा समझदार हो जाते हैं, जितनी समझ उन्होने सामीप्य से प्राप्त की थी। खोने के बाद, या खोता सा दिखने के बाद, सब अक्ल आ जाती है।
इस उपन्यास शृंखला में उस व्याधि की कथा है, जो व्याधि है, ये मानी भी जाती और अगर कहीं मानी भी जाती है तो लोग इसका इलाज वृथा मानते हैं। लोग जी रहे हैं इस व्याधि के साथ भी, इस व्याधि के बिना भी और इस व्याधि के बाद भी। ये व्याधि है, आसक्ति! कॉमन भाषा में, प्रेम! थोड़ा स्तर से समझौता कर लें तो इश्क़ का बुखार, मुहब्बत का मर्ज और दिल का दर्द, भी कह सकते हैं। खैर! आगे कहानी खुद अपने को कहेगी ही। लेकिन मुझे इस बात पर बड़ा गर्व है कि मैं जहर का स्वाद जानता हूँ और बताने के लिए जिंदा हूँ! फिर मिलते हैं! कल्याण हो!
हर्ष रंजन।
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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