Kamayani Ka Punarmulyakan

· Lokbharti Prakashan
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प्रस्तुत कृति के माध्यम से डॉ. चतुर्वेदी ने ‘कामायनी’ के पुनर्मूल्यांकन को सही दिशा दी है। जैसा कि उन्होंने स्वयं विवेचन किया है, आकर्षण-विकर्षण, आतंक-उपेक्षा तथा महानता-विश्वविद्यालयीयता के बीच कवि ‘प्रसाद’ का अब तक विवेचन ‘भाषा और संवेदना’ की रचनात्मक उपलब्धि के केन्द्रीय सत्य को व्याख्यायित करने में असमर्थ रहा है। डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार बिना इस पकड़ के ‘प्रसाद’ के काव्य का न सही मूल्यांकन हो सकता है और न उनके काव्य के अध्ययन के दौरान उठनेवाले सवालों का ठीक जवाब ही खोजा जा सकता है। लेखक ने बहुत सधे ढंग से ‘प्रसाद’ काव्य और मुख्यत: ‘कामायनी’ के गहरे और सूक्ष्म सांस्कृतिक सन्दर्भों को विवेचित करने की चेष्टा की है, और बिम्ब-विधान के माध्यम से उनकी रचनात्मक क्षमता को प्रतिपादित करने का प्रयास किया है। वस्तुत: काव्य रचनात्मक संश्लेष को उसकी सम्पूर्ण जटिलता में विवृत करने का सबसे दक्ष उपाय यही है। यह एक संक्षिप्त अध्ययन है, और इस कारण अध्येता पाठक अतृप्त रह जाने के कारण कुछ असन्तोष का अनुभव कर सकता है। परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि इस असन्तोष को जिज्ञासा में रूपान्तरित करती हुई यह कृति ‘प्रसाद’ काव्य को समझने में दूर तक हमारी सहायता करती है, और साथ ही काव्य की हमारी समझ को बढ़ाती है।
प्रस्तुत कृति के माध्यम से डॉ. चतुर्वेदी ने ‘कामायनी’ के पुनर्मूल्यांकन को सही दिशा दी है। जैसा कि उन्होंने स्वयं विवेचन किया है, आकर्षण-विकर्षण, आतंक-उपेक्षा तथा महानता-विश्वविद्यालयीयता के बीच कवि ‘प्रसाद’ का अब तक विवेचन ‘भाषा और संवेदना’ की रचनात्मक उपलब्धि के केन्द्रीय सत्य को व्याख्यायित कर...

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रामस्वरूप चतुर्वेदी जन्म: 1931 ई. में कानपुर में। आरंभिक शिक्षा पैतृक गाँव कछपुरा (आगरा) में हुई। बी.ए. क्राइस्ट चर्च, कानपुर से। एम.ए. की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1952 में। वहीं हिंदी विभाग में अध्यापन (1954-1991)। डी.फ़िल् की उपाधि 1958 में मिली, डी.लिट् की 1972 में। आरंभिक समीक्षापरक निबंध 1950 में प्रकाशित हुए। नयी प्रवृत्तियों से संबद्ध पत्रिकाओं का संपादन किया: ‘नये पत्ते’ (1952), ‘नयी कविता’ (1954), ‘क ख ग’ (1963)। शोध-त्रैमासिक ‘हिंदी अनुशीलन’ का संपादन (1960-1984)। प्रकाशन: शरत् के नारी पात्र (1955), हिंदी साहित्य कोश (सहयोग में संपादित - प्रथक भाग 1958, द्वितीय भाग 1963), हिंदी नवलेखन (1960), आगरा जिले की बोली (1961), भाषा और संवेदना (1964), अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या (1968), हिंदी साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियाँ (1969), कामायनी का पुनर्मूल्यांकन (1970), मध्यकालीन हिंदी काव्यभाषा (1974), नयी कविताएँ: एक साक्ष्य (1976), कविता यात्रा (1976), गद्य की सत्ता (1977), सर्जन और भाषिक संरचना (1980), इतिहास और आलोचक-: ष्टि (1982), हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986), काव्यभाषा पर तीन निबंध (1989), प्रसाद-निराला-अज्ञेय (1989), साहित्य के नये दायित्व (1991), कविता का पक्ष (1994), समकालीन हिंदी साहित्य: विविध परि: श्य (1995), हिंदी गद्य: विन्यास और विकास (1996), तारसप्तक से गद्यकविता (1997), भारत और पश्चिम: संस्कृति के अस्थिर संदर्भ (1999), आचार्य रामचंद्र शुक्ल - आलोचना का अर्थ: अर्थ की आलोचना (2001), भक्ति काव्य-यात्रा (2003)। संयुक्त संस्करण: भाषा-संवेदना और सर्जन (1996), आधुनिक कविता-यात्रा (1998)। आलोचना: सैद्धांतिक और व्यावहारिक, भाषाशास्त्र तथा विचारों के साहित्य में विशेष रुचि। सुषमा के साथ विवाह: 1955। तीन बेटे - विनीत (=पल्लवी), विनय (=दीपा), विवेक (=शेफाली)। साधना तथा व्यास सम्मान: 1996
रामस्वरूप चतुर्वेदी जन्म: 1931 ई. में कानपुर में। आरंभिक शिक्षा पैतृक गाँव कछपुरा (आगरा) में हुई। बी.ए. क्राइस्ट चर्च, कानपुर से। एम.ए. की उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1952 में। वहीं हिंदी विभाग में अध्यापन (1954-1991)। डी.फ़िल् की उपाधि 1958 में मिली, डी.लिट् की 1972 में। आरंभिक समीक्षापरक निब...

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