शाक्यमुनि गौतम बुद्ध को ‘‘दि लाइट आफ एशियां‘‘ तथा जगद्गुरु जैसे पदनाम से जाना जाता है क्योंकि उन्होंने संसार के मनुष्यों में प्रेम, करुणा, मैत्री, बन्धुता, समता, मानवता जैसे नैसर्गिक मानवीय मूल्यों को विकसित करके उनके अन्तर्निहित वास्तविक क्षमता का उपयोग करके समानतापूर्ण समरस समाज को संरचना में अहम भूमिका का निर्वहन किया था। वे परिकल्पित पारलौकिक आत्मा-परमात्मा, देवी-देवता स्वर्ग-नरक, भूत-पिचास में विश्वास करना अधम्म मानते थे। उनका मत था कि एक वर्ग उनका भय दिखाकर पाखण्ड तथा अन्धविश्वास को बढ़ावा देता है तथा मानव समाज में विभेद पैदा करता है।बुद्ध काल के पूर्व से जन मानस धार्मिक आडम्बर पाखण्डपूर्ण रूढ़ियो, अप्राकृतिक व असमानतापूर्ण चतुर्वणी सामाजिक व्यवस्था वैदिक हिसंक यज्ञादि की जटिलता से मुक्त होने के लिए तड़प रहा था। ऐसे समय में शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का एक सामाजिक वैज्ञानिक तथा दार्शनिक के रूप में अवतरण हुआ था जिन्होनें मानव समाज में व्याप्त अज्ञानरुपी बादल की घटाओं को छाँट करके सत्य ज्ञान को प्रकाशित किया। इनकी धम्मदेशना शील, समाधि तथा प्रज्ञा पर आधारित है जो मानव चित्त को विशुद्ध तथा निर्मल करता है। विकार विमुक्त निर्मल मन स्वाभाविक रूप से प्रेम, सद्भाव मैत्री तथा करुणा से भर कर सुख व शान्ति का अनुभव करता है।
शाक्यमुनि गौतम बुद्ध को ‘‘दि लाइट आफ एशियां‘‘ तथा जगद्गुरु जैसे पदनाम से जाना जाता है क्योंकि उन्होंने संसार के मनुष्यों में प्रेम, करुणा, मैत्री, बन्धुता, समता, मानवता जैसे नैसर्गिक मानवीय मूल्यों को विकसित करके उनके अन्तर्निहित वास्तविक क्षमता का उपयोग करके समानतापूर्ण समरस समाज को संरचना में अ...