आचार्य प्रशांत की ताओ ते चिंग पर की गई व्याख्याओं पर आधारित पुस्तकमाला का यह तृतीय भाग है, जिसमें ग्रंथ के अध्याय नौ से चौदह तक की व्याख्या को संकलित किया गया है। यह व्याख्या इस प्राचीन और बहुमूल्य ग्रंथ को आज के मनुष्य के लिए जीवित, निकट और निर्णायक रूप से प्रासंगिक बना देती है। यह पुस्तक ताओ ते चिंग के सूत्रों का मर्म खोलती है, और उन्हें केवल पढ़ने या उद्धृत करने की वस्तु नहीं रहने देती, बल्कि पाठक के अपने जीवन से सीधा जोड़ देती है। पुस्तक में अध्याय 9 से 14 की व्याख्या मन, संबंध, कर्म, नेतृत्व, अनुभव, भय, सफलता और ध्यान जैसे जीवन के मूल पक्षों पर पाठक को गहरी स्पष्टता प्रदान करती है।
यह पुस्तक केवल ताओ ते चिंग को समझने का अवसर नहीं, स्वयं को अधिक ईमानदारी से देखने का निमंत्रण है। यदि आप किसी ऐसे ग्रंथ तक पहुँचना चाहते हैं जो समय बीत जाने पर भी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोता, और किसी ऐसी व्याख्या तक भी जो उसे आपके जीवन के लिए सजीव और आत्मीय बना दे, तो यह पुस्तक आपके लिए है।