मंडल के बाद जाति जिस तरह भारतीय समाज में एक नए विमर्श का बाना धरकर वापस आई, वह सत्तर और अस्सी के सामाजिक आदर्शवाद के लिए अकल्पनीय था। वृहत् विचारों की जगह अब जातियों के आधार पर अपनी अस्मिता की खोज होने लगी और राजनीति पहले जहाँ जातीय समीकरणों को वोटों में बदलने के लिए चुपके-चुपके गाँव की शरण लिया करती थी, उसका मौक़ा उसे अब शिक्षा के आधुनिक केन्द्रों में भी, खुलेआम मिलने लगा।
यह उपन्यास ऐसे ही एक शिक्षण-संस्थान के नए युवा की नई ज़ुबान और नई रफ़्तार में लिखी कहानी है। बड़े स्तर की राजनीति द्वारा छात्रशक्ति का दुरुपयोग, छात्रों के अपने जातिगत अहंकारों की लड़ाई, प्रेम त्रिकोण, छात्र-चुनाव, हिंसा, साज़िशें, हत्याएँ, बलात्कार जैसे इन सभी कहानियों के स्थायी चित्र बन गए हैं, वह सब इस उपन्यास में भी है और उसे इतने प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया गया है कि ख़ुद ही हम यह सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि अस्मिताओं की पहचान और विचार के विकेन्द्रीकरण को हमने सोवियत संघ के विघटन के बाद जितनी उम्मीद से देखा था, कहीं वह कोई बहुत बड़ा भटकाव तो नहीं था? लेकिन अच्छी बात यह है कि इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद अब उस भटकाव का आत्मविश्वास कम होने लगा है और नई पीढ़ी एक बड़े फ़लक पर, ज़्यादा वयस्क और विस्तृत सोच की खोज करती दिखाई दे रही है।