मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ में भारतीय समाज की कुरीतियों, विशेषकर दहेज-प्रथा और उम्र-असमान विवाह की त्रासदी को केंद्र में रखा गया है। कहानी की नायिका निर्मला एक शिक्षित, कोमल-हृदय युवती है, जिसका विवाह दहेज के अभाव में उससे कई वर्ष बड़े वकील तोताराम से कर दिया जाता है। उम्र का बड़ा अंतर, संकोच और सामाजिक दबाव पति-पत्नी के संबंधों में दूरी पैदा करते हैं। तोताराम अपने युवा पुत्र से निर्मला की निकटता को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है, जो परिवार में अविश्वास, तनाव और दुख को जन्म देता है।निर्मला अपने कर्म, स्नेह और संयम से परिवार को जोड़ने का प्रयास करती है, परन्तु सामाजिक तर्कहीनता और पुरुष-प्रधान मानसिकता उसकी पीड़ा बढ़ाती जाती है। अविश्वास, अपराध-बोध, मृत्यु और विघटन की घटनाएँ उसके जीवन को त्रासदी में बदल देती हैं।
यह उपन्यास दहेज, सामाजिक अन्याय, स्त्री-वेदना और पारिवारिक अविश्वास जैसे विषयों को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।
मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘निर्मला’ में भारतीय समाज की कुरीतियों, विशेषकर दहेज-प्रथा और उम्र-असमान विवाह की त्रासदी को केंद्र में रखा गया है। कहानी की नायिका निर्मला एक शिक्षित, कोमल-हृदय युवती है, जिसका विवाह दहेज के अभाव में उससे कई वर्ष बड़े वकील तोताराम से कर दिया जाता है। उम्र का बड़ा अंतर, ...