Bali

· Radhakrishna Prakashan
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मौजूदा समय में नैतिक ईमानदारी का अभिप्राय सिर्फ़ उसको सिद्ध कर देने-भर से होता है। वह कोई सामाजिक संस्था हो या राजनीतिक अथवा न्यायिक, उसको भी हमसे जवाब-तलब करने का अधिकार है, उसे संतुष्ट करने के लिए बस इतना काफ़ी है कि हम सबूतों के आधार पर अपनी पवित्रता को साबित कर दें। और, दुर्भाग्य से ईश्वरीय सत्ता भी उसी श्रेणी में आ गई लगती है। लेकिन नैतिकता की एक कसौटी अपना आत्म भी है और यही वह प्रामाणिक कसौटी है जो हमें हिप्पोक्रेसी और सच साबित कर दिए गए असत्यों की तहों में दुबके सतत दरों से हमें मुक्त करती है, हमारे पार्थिव संसार में सचाई और नैतिकता की व्यावहारिक स्थापना करती है।

यह नाटक इसी कसौटी के बारे में है। नाटक का विषय पशु-बलि है और कथा बताती है कि बलि आख़िर बलि है, वह जीते-जागते जीव की हो या आटे से बने पशु की। हिंसा तो तलवार चलाने की क्रिया में है, इसमें नहीं कि वह किस पर चलाई गई है।

हिंसा का यह विषयनिष्ठ, सूक्ष्म और उद्वेलक विश्लेषण गिरीश कारनाड ने एक पौराणिक कथा के आधार पर किया है जिसे उन्होंने तेरहवीं सदी के एक कन्नड़ महाकाव्य से लिया है। गिरीश कारनाड के नाटक हमेशा ही सभ्यता के शाश्वत द्वन्द्वों को रेखांकित करते हैं, यह नाटक भी उसका अपवाद नहीं है।

मौजूदा समय में नैतिक ईमानदारी का अभिप्राय सिर्फ़ उसको सिद्ध कर देने-भर से होता है। वह कोई सामाजिक संस्था हो या राजनीतिक अथवा न्यायिक, उसको भी हमसे जवाब-तलब करने का अधिकार है, उसे संतुष्ट करने के लिए बस इतना काफ़ी है कि हम सबूतों के आधार पर अपनी पवित्रता को साबित कर दें। और, दुर्भाग्य से ईश्वरीय स...

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