प्रेमचंद के नाटक “संग्राम” का यह अंश ग्रामीण जीवन, किसान-परिवार की सहज इच्छाओं, मानवीय करुणा और सामंती व्यवस्था के स्वभाव को उभारता है। हलधर और उसकी पत्नी राजेश्वरी बसंत के उजले वातावरण में अपनी खेती, भविष्य की जरूरतों, साहूकारी के बोझ और गृह-सुख की सरल आकांक्षाओं पर बातचीत करते हैं। पशु-पक्षियों के प्रति करुणा, श्रम-निष्ठा और घरेलू सादगी उनके चरित्र की पहचान है। गांव का उदार और न्यायप्रिय जमींदार सबलसिंह किसानों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करता है और बेगार का विरोध करता है। उसके भीतर आदर्शवाद, न्याय और मानवता तो है, पर साथ ही राजेश्वरी की सरल सुंदरता से उद्वेलित होकर उसके मन में दुविधा और आत्मसंघर्ष भी जागता है। ज्ञानी की संतान-लालसा, अदालतों की अन्यायपूर्ण व्यवस्था पर सबलसिंह के विचार, तथा ग्रामीण समाज में नैतिकता-कुशासन का द्वंद्व—ये सब मिलकर नाटक के सामाजिक “संग्राम” को आकार देते हैं।
प्रेमचंद के नाटक “संग्राम” का यह अंश ग्रामीण जीवन, किसान-परिवार की सहज इच्छाओं, मानवीय करुणा और सामंती व्यवस्था के स्वभाव को उभारता है। हलधर और उसकी पत्नी राजेश्वरी बसंत के उजले वातावरण में अपनी खेती, भविष्य की जरूरतों, साहूकारी के बोझ और गृह-सुख की सरल आकांक्षाओं पर बातचीत करते हैं। पशु-पक्षियों...