Samay Ki Shila Par

· Rajkamal Prakashan
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प्रख्यात कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने रिपोर्ताज़ के बारे में अपनी राय इन शब्दों में व्यक्त की है - ‘‘गत महायुद्ध ने चिकित्साशास्त्र के चीर-फाड़ (शल्य-क्रिया) विभाग को पेनसिलिन दिया और साहित्य के कथा-विभाग को रिपोर्ताज़।’’ रेणु का यह कथन हिंदी-साहित्य में रिपोर्ताज़ के आविर्भाव का काल-निर्धारण ही नहीं, उसकी सामाजिक भूमिका को भी रेखांकित करता है। रेणु मानवीय भावनाओं के अप्रतिम चितेरे हैं, लेकिन उनका रचनाकार मन उन सामाजिक, राजनीतिक और प्राकृतिक त्रासदियों को अनदेखा नहीं करता, जो किसी भी भावना-लोक को प्रभावित करती हैं। एक योद्धा रचनाकार के नाते रेणु ने स्वयं ऐसी त्रासदियों का सामना किया था। यही कारण है कि उनके अनेक कथा-रिपोर्ताज़, जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को भी समृद्ध किया, विभिन्न त्रासद स्थितियों का अत्यंत रचनात्मक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इतिहास पर अपने निशान छोड़ जानेवाली अनेक घटनाएँ, रचनाकार की विभिन्न भावस्थितियाँ, जीवन-स्थितियाँ और उसके लगाव-सरोकार इस विधा को निश्चय ही एक विशिष्ट ऊँचाई सौंपते हैं। ‘समय की शिला पर’ में रेणु के अब तक उपलब्ध सभी रिपोर्ताज़ संकलित हैं।
प्रख्यात कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने रिपोर्ताज़ के बारे में अपनी राय इन शब्दों में व्यक्त की है - ‘‘गत महायुद्ध ने चिकित्साशास्त्र के चीर-फाड़ (शल्य-क्रिया) विभाग को पेनसिलिन दिया और साहित्य के कथा-विभाग को रिपोर्ताज़।’’ रेणु का यह कथन हिंदी-साहित्य में रिपोर्ताज़ के आविर्भाव का काल-निर्धारण ही नहीं...

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About the author

हिन्दी कथा-साहित्य को सांगीतिक भाषा से समृद्ध करनेवाले फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में 4 मार्च, 1921 को हुआ। लेखन और जीवन, दोनों में दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष के प्रतिबद्ध रेणु ने राजनीति में भी सक्रिय हिस्सेदारी की। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में एक प्रमुख सेनानी की हैसियत से शामिल रहे। 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रान्ति और राजनीति में सक्रिय योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता के बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव। 1954 में बहुचर्चित उपन्यास मैला आँचल का प्रकाशन। कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज़ आदि विधाओं में भी लिखा। व्यक्ति और कृतिकार, दोनों ही रूपों में अप्रतिम। जीवन की सांध्य वेला में राजनीतिक आन्दोलन से पुनः गहरा जुड़ाव। जे.पी. के साथ पुलिस दमन के शिकार हुए और जेल गए। सत्ता के दमनचक्र के विरोध में पद्मश्री लौटा दी। मैला आँचल के अतिरिक्त आपके प्रमुख उपन्यास हैं: परती परिकथा और दीर्घतपा; ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप तथा सम्पूर्ण कहानियाँ में कहानियाँ संकलित हैं। संस्मरणात्मक पुस्तकें हैं: ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गन्ध, श्रुत-अश्रुत पूर्व। नेपाली क्रान्ति-कथा चर्चित रिपोर्ताज है।, भारत यायावर द्वारा सम्पादित रेणु रचनावली में फणीश्वरनाथ रेणु का सम्पूर्ण रचना-कर्म पाँच खंडों में प्रस्तुत किया गया है। 11 अप्रैल, 1977 को देहावसान।
हिन्दी कथा-साहित्य को सांगीतिक भाषा से समृद्ध करनेवाले फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में 4 मार्च, 1921 को हुआ। लेखन और जीवन, दोनों में दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष के प्रतिबद्ध रेणु ने राजनीति में भी सक्रिय हिस्सेदारी की। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्र...

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