Tulsidas Chandan Ghisain

· Rajkamal Prakashan
10 reviews
Ebook
175
Pages

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हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था ! यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है ! पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मकसद नहीं था ! उनका मकसद उसे बदलना था ! और यह काम समाज-सत्य पर प्रमाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना संभव नहीं हो सकता ! खास तौर पर अगर आपका माध्यम व्यंग्य जैसी विधा हो ! हरिशंकर परसाई के यहाँ ये सब खूबियाँ मिलती हैं ! उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता और वैचारिक स्पष्टता उनको व्यंग्य-साहित्य का नहीं विचार-साहित्य का पुरोधा बनाती है ! तुलसीदास चन्दन घिसैं के आलेखों का केंद्रीय स्वर मुख्यतः सत्ता और संस्कृति के सम्बन्ध हैं ! इसमें हिंदी साहित्य का समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों से उसके संबंधों के समीकरण बार-बार सामने आते हैं ! पाक्षिक 'सारिका' में 84-85 के दौरान लिखे गए इन निबंधों में परसाई जी ने उस दुर्लभ लेखकीय साहस का परिचय दिया है, जो न अपने समकालीनों को नाराज करने से हिचकता है और न अपने पूर्वजों से ठिठोली करने से जिसे कोई चीमड़ नैतिकता रोकती है ! गौरतलब यह कि इन आलेखों को पढ़ते हुए हमें बिलकुल यह नहीं लगता कि इन्हें आज से कोई तीन दशक पहले लिखा गया था ! हम आज भी वैसे ही हैं और आज भी हमें एक परसाई की जरूरत है जो चुटकियों से ही सही पर हमारी खाल को मोटा होने से रोकता रहे !
हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था ! यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है ! पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मकसद नहीं था ! उनका मकसद उसे बदलना था ! और यह काम समाज-सत्य पर प्रमाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना संभव नहीं हो सकता ! खास तौर पर अग...

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Ratings and reviews

10 reviews
metteyya buddha
July 2, 2023
no one in these days have guts like harishankar ji
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Sud Rock
June 24, 2020
Extremely Hinduphobic
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About the author

हरिशंकर परसाई 22 अगस्त, 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में जन्मे हरिशंकर परसाई का आरम्भिक जीवन कठिन संघर्ष का रहा। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और फिर ‘डिप्लोमा इन टीचिंग’ का कोर्स भी। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, वैष्णव की फिसलन, पगडंडियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, सदाचार का ताबीज, विकलांग श्रद्धा का दौर, तुलसीदास चन्दन घिसैं, हम इक उम्र से वाकिफ हैं, निठल्ले की डायरी, आवारा भीड़ के खतरे, जाने-पहचाने लोग, कहत कबीर, ठिठुरता हुआ गणतंत्र (व्यंग्य निबन्ध-संग्रह); पूछो परसाई से (साक्षात्कार)। ‘परसाई रचनावली’ शीर्षक से छह खंडों में आपकी सभी रचनाएँ संकलित हैं। आपकी रचनाओं के अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में हुए हैं। आपको केन्द्रीय साहित्य अकादेमी पुरस्कार, मध्य प्रदेश के शिखर सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। आपका निधन 10 अगस्त, 1995 को हुआ।
हरिशंकर परसाई 22 अगस्त, 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गाँव में जन्मे हरिशंकर परसाई का आरम्भिक जीवन कठिन संघर्ष का रहा। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया और फिर ‘डिप्लोमा इन टीचिंग’ का कोर्स भी। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—हँसते हैं रोते है...

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