आँखों की ख्वाहिशें हर पल मुझे इम्तिहान करवाती है।
खैर पूरी नहीं होती लेकिन इन्हीं इम्तिहानो से जिंदा हू।।
जाने क्यु यादों को आसुओं से सीचने की कोशिश हर बार नाकाम हो जाती है।
खैर पत्थर बन चुका है यह दिल इन्हीं नाकाम कोशिशों से जिंदा हू।।
सोचा भुला दु सारे जज़्बातों को पर ये तन्हाई रुला कर जाती है।
खैर अब हिम्मत नहीं है भीड़ मे जाने की इसी तन्हाई के सहारे जिंदा हू।।
The author is a simple person who is searching for something in life.But he is unaware that in life one gets only what is written in his destiny.