VAVARI SHENG

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गावरान भाषेचा बाज जसाच्या तसा ठेवून ग्रामीण संस्कृती-रिती-रिवाज याचं तंतोतंत चित्र उभं करणार्या या खास गावरान कथा...शंकर पाटलांची कथा ही मराठी कथेचे एक लेणे आहे त्यांचे मन अतिशय संस्कारक्षम आहे. केवळ ग्रामीण जीवनदर्शन घडवावे असा त्यांचा हेतू नसतो किंवा लोकप्रियता मिळविण्यासाठी गावरान किस्से सांगावेत असाही त्यांचा हेतू नाही. तसेच त्यांनी शहरी वाचकांचे भान ठेवून कथालेखन केले नाही. कथा हे आत्मशोधाचे साधन आहे, ही जाणीव शंकर पाटलांना आहे. १९५० पासून त्यांचा कथालेखनाचा प्रवास पाहिला तर लक्षात येईल, पण ग्रामीण मन ज्या समाजव्यवस्थेत वाढते आहे त्यात स्वातंत्र्य समतादी मूल्यांची रुजवण झालेली नाही, त्याचे त्यांना दु:ख आहे. पाटील परंपरेपेक्षा परिवर्तनावर श्रद्धा ठेवतात. त्यांना ग्रामीण प्रश्नांचे भान आहे; आणि म्हणूनच त्यांच्या कथेचा अवतार केवळ रंजनार्थ नाही, त्यांच्या लेखनामागे सामाजिक जाणीव आहे, मूल्यांवर अधिष्ठीत आ समाजव्यवस्थेचे चित्र त्यांच्या समोर आहे; म्हणून तर ते आपल्या कथांतून बेगडी परिवर्तनाचे व्यंगचित्रण करतात, अनुभव कधी शोधून सापडतात? ते अपसुक यावे लागतात. पाटलांच्या कथा अशाच रितीने त्यांचे बोट धरून आल्या असाव्यात पण या कथा निर्मिती मागे केवढी प्रचंड घडामोड आहे, गुंतागुंत आहे. जणू चिंतनाच्या डोहातूनच ती जन्मते. जवळ जवळ २५ ते ३० वर्षे पाटलांची कथा वाटचाल करीत आहे तीने मराठी कथेला "श्रीमंत'' केले आहे हे कुणाला नाकारता येईल काय! डॉ. भालचंद्र फडके 
गावरान भाषेचा बाज जसाच्या तसा ठेवून ग्रामीण संस्कृती-रिती-रिवाज याचं तंतोतंत चित्र उभं करणार्या या खास गावरान कथा...शंकर पाटलांची कथा ही मराठी कथेचे एक लेणे आहे त्यांचे मन अतिशय संस्कारक्षम आहे. केवळ ग्रामीण जीवनदर्शन घडवावे असा त्यांचा हेतू नसतो किंवा लोकप्रियता मिळविण्यासाठी गावरान किस्से सांगा...

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