Socha Na Tha

· Rajkamal Prakashan
7 reviews
Ebook
275
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सोचा न था उदासी, ऊब, सपनों और सपनों के नामालूम ढंग से टूट जाने की कहानी है। इस उपन्यास में लेखिका ने एक अत्यन्त सामान्य कथानक के भीतर छिपी असामान्य उत्सुकताओं की खोज की है। माया, जो इस उपन्यास की मुख्य चरित्र है, देखती आँखों उसकी जि़न्दगी में किसी तरह का कोई अभाव नहीं, कोई दुख नहीं—सुन्दर, सुशिक्षित। कलकत्ता जैसे महानगर से मुम्बई जैसे महानगर में आई एक संस्कारवान बांग्ला बहू। एक आधुनिक गृहिणी। रंजन मलिक जैसे अमेरिका-पलट बैंक अधिकारी की बीवी। फिर भी माया के दाम्पत्य जीवन में वह कौन-सी कमी थी, जिसे पूरा करने के लिए वह निखिल जैसे युवक की ओर आकर्षित होती है? अंग्रेज़ी की बहुचर्चित कथाकार शोभा डे अपने इस उपन्यास में स्त्री-जीवन के इसी प्रश्न को उठाती हैं। दाम्पत्य सम्बन्धों के व्यावहारिक पहलुओं और उसकी छोटी-बड़ी बारीकियों को खोलते हुए वे उक्त प्रश्न के सम्भावित उत्तर को भी संकेतित करती हैं। स्पष्टतया कहा जाए तो पति-पत्नी का सम्बन्ध मात्र सामाजिक, औपचारिक ही नहीं, वह एक गहन भावनात्मक और आत्मिक जि़म्मेदारी भी है। इसका अभाव एक स्त्री को भटकाव का अवसर ही नहीं, तर्क भी देता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तर्क को सामने रखते हुए शोभा डे न तो नारी-मनोविज्ञान को अनदेखा करती हैं और न ही हमारे मध्यवर्गीय ढोंग तथा महत्त्वाकांक्षाओं को। ऐसे में स्त्री हो या पुरुष, उसका पाना और खोना जैसे एक-दूसरे का पर्याय बन जाता है। आधुनिक जीवन की विसंगतियों, आकर्षणों, और सम्भावनाओं की लेखिका शोभा डे का सितारों की रातें के बाद हिन्दी में यह दूसरा उपन्यास है। एक सिद्धहस्त रचनाकार अपने चरित्रों का अंकन किस कुशलता से करता है, यह देखने के लिए इस उपन्यास को पढ़ा जाना अनिवार्य है। छोटे-छोटे हाशिये पर रहने वाले पात्र भी आपको कहानी के भूगोल में अपने पूरे स्वायत्त व्यक्तित्व के साथ खड़े मिलेंगे।
सोचा न था उदासी, ऊब, सपनों और सपनों के नामालूम ढंग से टूट जाने की कहानी है। इस उपन्यास में लेखिका ने एक अत्यन्त सामान्य कथानक के भीतर छिपी असामान्य उत्सुकताओं की खोज की है। माया, जो इस उपन्यास की मुख्य चरित्र है, देखती आँखों उसकी जि़न्दगी में किसी तरह का कोई अभाव नहीं, कोई दुख नहीं—सुन्दर, सुशिक्...

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About the author

वर्ष 1948 में महाराष्ट्र में जन्मी शोभा डे की शिक्षा दिल्ली और मुम्बई में हुई। मुम्बई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से उन्होंने मनोविज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और 1970 में पत्राकारिता जगत में कदम रखा। उन्होंने तीन चर्चित पत्रिकाओं–स्टारडस्ट, सोसायटी और सेलिब्रिटी–की नींव रखी और उनका सम्पादन किया। सन्डे और मेगा सिटी पत्रिकाओं की वे सलाहकार सम्पादक रहीं। शोभा डे आजकल स्वतंत्रा लेखन में रत हैं। वे कई अखबारों और पत्रिकाओं के लिए कॉलम लिखती हैं जिनमें प्रमुख हैं : द टाइम्स ऑफ इंडिया, द स्टेट्समैन, इंडियन एक्सप्रेस और द वीक। 1988 में उन्होंने अपना पहला बहुचर्चित उपन्यास सोशलाइट इवनिंग्स लिखा था।
वर्ष 1948 में महाराष्ट्र में जन्मी शोभा डे की शिक्षा दिल्ली और मुम्बई में हुई। मुम्बई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज से उन्होंने मनोविज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और 1970 में पत्राकारिता जगत में कदम रखा। उन्होंने तीन चर्चित पत्रिकाओं–स्टारडस्ट, सोसायटी और सेलिब्रिटी–की नींव रखी और उनका सम्पादन किया...

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