Shamshan Champa

· Radhakrishna Prakashan
8 ವಿಮರ್ಶೆಗಳು
ಇ-ಪುಸ್ತಕ
122
ಪುಟಗಳು

ಈ ಇ-ಪುಸ್ತಕದ ಕುರಿತು

‘चम्पा तुझ में तीन गुण, रूप, रंग अरु बास। अवगुण तुझमें एक है, भ्रमर न आवत पास।। एक थी चम्पा। रूप, रंग और गुणों की मादक कस्तूरी गंध लिए चम्पा। लेकिन पिता की मृत्यु, बिगड़ैल छोटी बहन की कलंक-गाथा और स्वयं उसके दुर्भाग्य ने उसे बुरी तरह झकझोर डाला। बाहर से आत्मतुष्ट, संयमी और आत्मविश्वासी दीखने वाली डॉक्टर चम्पा के अभिशप्त जीवन की वेदना की मार्मिक कहानी है ‘श्मशान चम्पा’। एक परम्परा प्रेमी और आज्ञाकारी बेटी जो सबको इलाज और निर्बाध सेवा दे सकती थी, पर अपने अभिशप्त एकाकी जीवन का सन्नाटा भंग नहीं कर पाती है। सुख के शिखर पर पहुँचाकर स्वयं नियति ही निर्ममता से उसे बार-बार नीचे गिराती अनिश्चय की घाटियों में भटकने को भेजती रहती है।
‘चम्पा तुझ में तीन गुण, रूप, रंग अरु बास। अवगुण तुझमें एक है, भ्रमर न आवत पास।। एक थी चम्पा। रूप, रंग और गुणों की मादक कस्तूरी गंध लिए चम्पा। लेकिन पिता की मृत्यु, बिगड़ैल छोटी बहन की कलंक-गाथा और स्वयं उसके दुर्भाग्य ने उसे बुरी तरह झकझोर डाला। बाहर से आत्मतुष्ट, संयमी और आत्मविश्वासी दीखने वाली...

ಇನ್ನಷ್ಟು ಡಿಸ್ಕವರ್ ಮಾಡಿ

ರೇಟಿಂಗ್‌ಗಳು ಮತ್ತು ಅಭಿಪ್ರಾಯಗಳು

8 ವಿಮರ್ಶೆಗಳು

ಲೇಖಕರ ಕುರಿತು

गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्वनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्रेमी और कईं भाषाओं के ज्ञाता थे । साहित्य और संगीत के पति एक गहरी रुझान 'शिवानी' को उनसे ही मिली । शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कटूटर सनातनी थे । महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी । वे प्राय: अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अत: अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी को छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता । उनकी किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में, और युवावस्था अपने शिक्षाविद पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में । पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमरीका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया । उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अदभुत मेल है, उसकी जडें इसी विविधमयतापूर्ण जीवन में थीं । शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलनेवाली 'नटखट' नामक एक बाल पत्रिका में छपी थी । तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं । इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बडी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गई, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन्हें 'गोरा' पुकारते थे । उनकी ही सलाह, कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, शिरोधार्य कर उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया । 'शिवानी' की पहली लघु रचना "मैं मुर्गा हूँ’ 1951 में धर्मयुग में छपी थी । इसके बाद आई उनकी कहानी 'लाल हवेली' और तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक अनवरत चलता रहा । उनकी अन्तिम दो रचनाएँ ‘सुनहुँ तात यह अकथ कहानी' तथा 'सोने दे' उनके विलक्षण जीवन पर आधारित आत्मवृत्तात्मक आख्यान हैं । 1979 में शिवानी जी को पदूमश्री से अलंकृत किया गया । उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलनेवाले पत्र 'स्वतंत्र भारत' के लिए 'शिवानी' ने वषों तक एक चर्चित स्तम्भ 'वातायन' भी लिखा । उनके लखनऊ स्थित आवास-66, गुलिस्तां कालोनी के द्वार लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग से जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे । 21 मार्च 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।
गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्वनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्...

ಈ ಇ-ಪುಸ್ತಕಕ್ಕೆ ರೇಟಿಂಗ್ ನೀಡಿ

ನಿಮ್ಮ ಅಭಿಪ್ರಾಯವೇನು ಎಂದು ನಮಗೆ ತಿಳಿಸಿ.

ಮಾಹಿತಿ ಓದುವಿಕೆ

ಸ್ಮಾರ್ಟ್‌ಫೋನ್‌ಗಳು ಮತ್ತು ಟ್ಯಾಬ್ಲೆಟ್‌‌ಗಳು
Android ಮತ್ತು iPad/iPhone ಗೆ Google Play ಪುಸ್ತಕಗಳ ಆ್ಯಪ್ ಇನ್‌ಸ್ಟಾಲ್ ಮಾಡಿ. ಇದು ನಿಮ್ಮ ಖಾತೆಯನ್ನು ಸ್ವಯಂಚಾಲಿತವಾಗಿ ಸಿಂಕ್‌ ಮಾಡುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ನೀವು ಎಲ್ಲೇ ಇರಿ ಆನ್‌ಲೈನ್‌ ಅಥವಾ ಆಫ್‌ಲೈನ್‌ನಲ್ಲಿ ಪುಸ್ತಕಗಳನ್ನು ಓದಲು ಅನುಮತಿಸುತ್ತದೆ.
ಲ್ಯಾಪ್‌ಟಾಪ್‌ಗಳು ಮತ್ತು ಕಂಪ್ಯೂಟರ್‌ಗಳು
Google Play ನಲ್ಲಿ ಖರೀದಿಸಿದ ಆಡಿಯೋಬುಕ್‌ಗಳನ್ನು ನಿಮ್ಮ ವೆಬ್‌ ಬ್ರೌಸರ್‌ನ ಕಂಪ್ಯೂಟರ್‌ನ ಲ್ಲಿ ಆಲಿಸಬಹುದು.
eReaders ಮತ್ತು ಇತರ ಸಾಧನಗಳು
Kobo ಇ-ರೀಡರ್‌ಗಳಂತಹ ಇ-ಇಂಕ್ ಸಾಧನಗಳ ಕುರಿತು ಓದಲು, ನೀವು ಫೈಲ್ ಅನ್ನು ಡೌನ್‌ಲೋಡ್ ಮಾಡಬೇಕಾಗುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಅದನ್ನು ನಿಮ್ಮ ಸಾಧನಕ್ಕೆ ವರ್ಗಾಯಿಸಬೇಕು. ಫೈಲ್‌ಗಳು ಮತ್ತು ಬೆಂಬಲಿತ ಇ-ರೀಡರ್‌ಗಳನ್ನು ವರ್ಗಾವಣೆ ಮಾಡಲು ವಿವರವಾದ ಸಹಾಯ ಕೇಂದ್ರ ಸೂಚನೆಗಳನ್ನು ಅನುಸರಿಸಿ.