Safai Devta

· Radhakrishna Prakashan
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ख्यात दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस पुस्तक में देश-समाज के सबसे उपेक्षित तबक़े भंगी या वाल्मीकि की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ मौजूदा वास्तविक स्थिति का सप्रमाण वर्णन करने का प्रयास किया गया है।

‘भंगी’—शब्द सुनकर ही लोगों की भौंहें तन जाती हैं। समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना ने उनमें इस हद तक हीनताबोध भर दिया है कि वाल्मीकि समाज के उच्च शिक्षित लोग भी अपनी पहचान छुपाते फिरते हैं। दलितों में दलित यह तबक़ा आर्थिक विपन्नता की दलदल में फँसा है। पुनर्वसन की राजनीति करनेवाले इस तंत्र में इन सफ़ाई कर्मचारियों के पुनर्वसन की ज़रूरत कभी किसी ने महसूस नहीं की। उच्चवर्गीय, ब्राह्मणवादी मानसिकता और सामन्ती सोच-विचार के लोग इन्हें कोई भी सामाजिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं हैं।

इस पुस्तक का उद्देश्य ऐतिहासिक उत्पीड़न, शोषण और दमन का विश्लेषण करना है। उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का आकलन करना है, और उसके सामने खड़ी समस्याओं का विवेचन करना है। इसके लिए ऐतिहासिक विवरण ही काफ़ी नहीं हैं, वर्तमान का मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है। लेखक का उद्देश्य लम्बे भीषण, नारकीय दौर में वाल्मीकि समाज की उपलब्धियों, संघर्षों की खोज कर, ऐसी मिसाल पेश करना है जो भविष्य के अन्धकार से उसे बाहर निकलने की प्रेरणा दे सके।

ख्यात दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की इस पुस्तक में देश-समाज के सबसे उपेक्षित तबक़े भंगी या वाल्मीकि की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ मौजूदा वास्तविक स्थिति का सप्रमाण वर्णन करने का प्रयास किया गया है। ‘भंगी’—शब्द सुनकर ही लोगों की भौंहें तन जाती हैं। समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना ने उनमें इस हद तक ह...

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