जिस स्थान पर और जिन परिस्थितियों में जन्म मिला; उसके अनुकूल आचरण को ही भाग्यलेख मान लेना तो अत्यंत सहज है। ऐसा तो पशु भी करते ही हैं; परंतु मानव को यदि सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है; तो इसके पीछे कारण केवल इतना ही है कि वह इस भाग्यलेख को मिटाकर अपनी इच्छाशक्ति के बूते पर अपना भाग्य स्वयं लिख सकता है; और वैसा लिख सकता है; जैसा वह चाहता है। इच्छाशक्ति की यही अदम्य दृढ़ता मिलती है; डॉ. भीम राव आंबेडकर के जीवनचरित में। अछूत-संतान से लेकर ‘भारत-रत्न’ की उपाधि तक पहुँचने तक का उनका सारा इतिहास ही कड़े संघर्ष की गाथा है।
जिस स्थान पर और जिन परिस्थितियों में जन्म मिला; उसके अनुकूल आचरण को ही भाग्यलेख मान लेना तो अत्यंत सहज है। ऐसा तो पशु भी करते ही हैं; परंतु मानव को यदि सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है; तो इसके पीछे कारण केवल इतना ही है कि वह इस भाग्यलेख को मिटाकर अपनी इच्छाशक्ति के बूते पर अपना भाग्य स्वयं लिख सकता...