Pootowali

· Radhakrishna Prakashan
1 iritzi
Liburu elektronikoa
155
orri

Liburu elektroniko honi buruz

‘पूतोंवाली’ एक ऐसी स्त्राी की विडम्बना-भरी जीवनगाथा है, जो पाँच-पाँच सुयोग्य-मेधावी बेटों की माँ होकर भी अंत तक निपूती रही। शहरी चकाचौंध और सम्पन्नता की ठसक भरे जीवन के मद में अपने सरल लेकिन उत्कट स्वाभिमानी पिता और स्निग्ध, वात्सल्यमयी माँ के दधीचि जैसे उत्सर्ग भरे जीवन की अवहेलना करनेवाले बेटों का ठंडा व्यवहार आज के जीवन में घर-घर की कहानी बन चला है। पूतोंवाली क्षय होते पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों के पक्ष में एक मार्मिक गुहार है। ‘कैंजा’ यानी सौतेली माँ। एक ऐसा ओहदा जिसकी मर्यादा प्राणपण से निभाने के बाद भी निष्कलुष-मना नन्दी उसका पारम्परिक कलुष नहीं उतार पाती। बेटा रोहित समाज की कानाफूसी से विह्नल हो विद्रोही बनता जाता है। उसके फेंके पत्थरों से सिर्फ शीशा ही नहीं टूटता, नन्दी का हृदय भी विदीर्ण हो जाता है। एक ऐसी युवती की मार्मिक कथा, जो जन्मदायिनी माँ न होते हुए भी अपने सौतेले बेटे से सच्चा प्रेम करने की भूल कर बैठी है। ...‘‘आँधी की ही भाँति वह मुझे अपने साथ उड़ा ले गई थी, और जब लौटी तो उसका घातक विष मेरे सर्वांग में व्याप चुका था।...’’ कौन थी यह रहस्यमयी प्रतिवेशिनी जो नियति के लिखे को झुठलाने अकेली उस भुतही कोठी में आन बसी थी? ‘विषकन्या’ में शिवानी की जादुई कलम ने उकेरी है दो यकसाँ जुड़वाँ बहनों की मार्मिक कहानी और उनमें से एक के ईर्ष्या से सुलगते जीवन की केन्द्रीय विडम्बना, जो स्पर्शमात्रा से किसी के जीवन में हलाहल घोल देती है। ...सावित्राी के दोनों बेटे विदेश चले जाते हैं। एक यात्रा के दौरान ट्रेन में मिला लावारिस बच्चा ही अन्तिम दिनों में उसके साथ रहता है। सावित्राी अपनी सारी सम्पत्ति इसी तीसरे बेटे के नाम कर जाती है, परन्तु भाभियों का यह ताना सुनकर कि उसने धन पाने के लिए माँ की सेवा की, तीसरा बेटा गंगा वसीयतनामे को फाड़कर भाइयों के मुँह पर फेंक देता है। लोकप्रिय लेखिका की कलम से निकली एक और मार्मिक कथा।
‘पूतोंवाली’ एक ऐसी स्त्राी की विडम्बना-भरी जीवनगाथा है, जो पाँच-पाँच सुयोग्य-मेधावी बेटों की माँ होकर भी अंत तक निपूती रही। शहरी चकाचौंध और सम्पन्नता की ठसक भरे जीवन के मद में अपने सरल लेकिन उत्कट स्वाभिमानी पिता और स्निग्ध, वात्सल्यमयी माँ के दधीचि जैसे उत्सर्ग भरे जीवन की अवहेलना करनेवाले बेटों...

Ezagutu gehiago

Balorazioak eta iritziak

1 iritzi

Egileari buruz

गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्वनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्रेमी और कईं भाषाओं के ज्ञाता थे । साहित्य और संगीत के पति एक गहरी रुझान 'शिवानी' को उनसे ही मिली । शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कटूटर सनातनी थे । महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी । वे प्राय: अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अत: अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी को छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता । उनकी किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में, और युवावस्था अपने शिक्षाविद पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में । पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमरीका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया । उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अदभुत मेल है, उसकी जडें इसी विविधमयतापूर्ण जीवन में थीं । शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलनेवाली 'नटखट' नामक एक बाल पत्रिका में छपी थी । तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं । इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बडी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गई, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन्हें 'गोरा' पुकारते थे । उनकी ही सलाह, कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, शिरोधार्य कर उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया । 'शिवानी' की पहली लघु रचना "मैं मुर्गा हूँ’ 1951 में धर्मयुग में छपी थी । इसके बाद आई उनकी कहानी 'लाल हवेली' और तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक अनवरत चलता रहा । उनकी अन्तिम दो रचनाएँ ‘सुनहुँ तात यह अकथ कहानी' तथा 'सोने दे' उनके विलक्षण जीवन पर आधारित आत्मवृत्तात्मक आख्यान हैं । 1979 में शिवानी जी को पदूमश्री से अलंकृत किया गया । उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलनेवाले पत्र 'स्वतंत्र भारत' के लिए 'शिवानी' ने वषों तक एक चर्चित स्तम्भ 'वातायन' भी लिखा । उनके लखनऊ स्थित आवास-66, गुलिस्तां कालोनी के द्वार लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग से जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे । 21 मार्च 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।
गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्वनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्...

Baloratu liburu elektroniko hau

Eman iezaguzu iritzia.

Irakurtzeko informazioa

Telefono adimendunak eta tabletak
Instalatu Android eta iPad/iPhone gailuetarako Google Play Liburuak aplikazioa. Zure kontuarekin automatikoki sinkronizatzen da, eta konexioarekin nahiz gabe irakurri ahal izango dituzu liburuak, edonon zaudela ere.
Ordenagailu eramangarriak eta mahaigainekoak
Google Play-n erositako audio-liburuak entzuteko aukera ematen du ordenagailuko web-arakatzailearen bidez.
Irakurgailu elektronikoak eta bestelako gailuak
Tinta elektronikoa duten gailuetan (adibidez, Kobo-ko irakurgailu elektronikoak) liburuak irakurtzeko, fitxategi bat deskargatu beharko duzu, eta hura gailura transferitu. Jarraitu laguntza-zentroko argibide xehatuei fitxategiak irakurgailu elektroniko bateragarrietara transferitzeko.