मेरी बेटी बेहतर विकल्पों के लिए बाहर चली गई है; मेरी पत्नी अपने कॅरियर में व्यस्त है तो खाना अब पहले की तरह ‘स्वादिष्ट’ नहीं रहा; जिसमें प्रेम; लगाव; देखभाल करनेवाले शब्दों के साथ पूछताछ होती थी। सबसे बढ़कर वह वात्सल्य होता; जो इस धरती पर तो केवल माँ ही दे सकती है; खासतौर पर अपने बच्चों को। जब भी किसी दिन मैं अकेला भोजन के लिए बैठता हूँ तो मेरे कानों में माँ के शब्द गूँजते; ‘क्या तुम कुछ और खाओगे;’ ‘आज तुमने क्या खाया है;’ और मैं मूर्खों की तरह चारों ओर देखता हूँ; जबकि मुझे अच्छी तरह मालूम है कि ऐसे पूछनेवाला आस-पास कोई नहीं है। भीतर कहीं हूक सी उठती है कि कोई यह पूछनेवाला नहीं है। साफ कहूँ तो अब उन शब्दों में संगीत सुनाई देता है; फिर चाहे आँखें भीग ही क्यों न आई हों। कभी-कभी तो मैं अकेले खाने से घबराने लगता हूँ। शायद इसलिए बडे़-बुजुर्ग कहते हैं कि पूरे परिवार को कम-से-कम एक बार भोजन साथ लेना चाहिए।
—इसी पुस्तक से
क्लासरूम की ये प्रेरक कहानियाँ हमारे आस-पास तथा दैनिक जीवन से संबंधित हैं। कुछ नया करने की प्रेरणा देनेवाली कहानियाँ।
मेरी बेटी बेहतर विकल्पों के लिए बाहर चली गई है; मेरी पत्नी अपने कॅरियर में व्यस्त है तो खाना अब पहले की तरह ‘स्वादिष्ट’ नहीं रहा; जिसमें प्रेम; लगाव; देखभाल करनेवाले शब्दों के साथ पूछताछ होती थी। सबसे बढ़कर वह वात्सल्य होता; जो इस धरती पर तो केवल माँ ही दे सकती है; खासतौर पर अपने बच्चों को। जब भी...