Mayapuri

· Radhakrishna Prakashan
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Llibre electrònic
167
Pàgines

Sobre aquest llibre

लखनऊ की मायापुरी और उसमें पालतू बिल्ली सी घुरघुराती नर्माई लिए प्रतिवेशी प्रवासी परिवार में पहाड़ के सुदूर ग्रामीण अंचल से आई शर्मीली सुन्दरी शोभा का आना बड़े उत्साह का कारण बना, विशेषकर घर की बेटी मंजरी के लिए। पर पिता के बाल्यकालीन मित्र के उस परिवार में घर के बेटे सतीश के विदेश से लौटने पर लहरें उठने लगीं। शोभा और सतीश, अविनाश और मंजरी, युवा जोड़ों के बीच आकर्षण विकर्षण की रोचक घुमेरियों से भरी मायापुरी की कहानी में नकचढ़ी मंत्री दुहिता एक झंझा की तरह प्रवेश करती है, और देखते-देखते सतीश उसकी दुनिया का भाग बनने लगता है। पर क्या नेह-छोह के बन्धन सहज टूटते हैं? नैनीताल वापस लौटी शोभा के जीवन को रुक्की, रामी, रानीसाहिबा और उनके रहस्मय जीवन की परछाईंयाँ कैसे घेरने लगती हैं? स्त्री-पुरुष के चिरन्तन आकर्षण की मरीचिकामय मायापुरी तथा जीवन की कठोर वास्तविकता के टकराव से भरा यह उपन्यास आज भी अपनी अलग पहचान रखता है।
लखनऊ की मायापुरी और उसमें पालतू बिल्ली सी घुरघुराती नर्माई लिए प्रतिवेशी प्रवासी परिवार में पहाड़ के सुदूर ग्रामीण अंचल से आई शर्मीली सुन्दरी शोभा का आना बड़े उत्साह का कारण बना, विशेषकर घर की बेटी मंजरी के लिए। पर पिता के बाल्यकालीन मित्र के उस परिवार में घर के बेटे सतीश के विदेश से लौटने पर लहरें...

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Sobre l'autor

गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्वनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्रेमी और कईं भाषाओं के ज्ञाता थे । साहित्य और संगीत के पति एक गहरी रुझान 'शिवानी' को उनसे ही मिली । शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कटूटर सनातनी थे । महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी । वे प्राय: अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अत: अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी को छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता । उनकी किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में, और युवावस्था अपने शिक्षाविद पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में । पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमरीका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया । उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अदभुत मेल है, उसकी जडें इसी विविधमयतापूर्ण जीवन में थीं । शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलनेवाली 'नटखट' नामक एक बाल पत्रिका में छपी थी । तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं । इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बडी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गई, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन्हें 'गोरा' पुकारते थे । उनकी ही सलाह, कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, शिरोधार्य कर उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया । 'शिवानी' की पहली लघु रचना "मैं मुर्गा हूँ’ 1951 में धर्मयुग में छपी थी । इसके बाद आई उनकी कहानी 'लाल हवेली' और तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक अनवरत चलता रहा । उनकी अन्तिम दो रचनाएँ ‘सुनहुँ तात यह अकथ कहानी' तथा 'सोने दे' उनके विलक्षण जीवन पर आधारित आत्मवृत्तात्मक आख्यान हैं । 1979 में शिवानी जी को पदूमश्री से अलंकृत किया गया । उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलनेवाले पत्र 'स्वतंत्र भारत' के लिए 'शिवानी' ने वषों तक एक चर्चित स्तम्भ 'वातायन' भी लिखा । उनके लखनऊ स्थित आवास-66, गुलिस्तां कालोनी के द्वार लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग से जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे । 21 मार्च 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।
गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्वनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्...

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