Dhruvswamini

· Rajkamal Prakashan
31 reviews
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59
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ध्रुवस्वामिनी प्रसाद जी का अन्तिम नाटक है और उनके पूरे नाटक-साहित्य में एकदम अलग भी। इसमें न तो पहले नाटकों जैसी काव्यजनोचित भावुकता है और न ही संवादों की वैसी जटिलता। यह नाटक इस बात का प्रमाण है कि प्रसाद जी अपने अन्तिम समय में यथार्थवादी नाटक लेखन की तरफ मुड़ रहे थे। अपने जीवन्त संवादों और कसी हुई कथावस्तु के कारण यह नाटक अत्यन्त प्रभावशाली और मंचोपयोगी हो गया है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी शक्ति प्रसादजी के उस क्रान्तिकारी दृष्टिकोण में निहित है जो ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से प्रकट हुआ है। नारी केवल नर की अनुगता नहीं है। पुरुष यदि नपुंसक, व्यभिचारी और कायर है तो नारी उसके विरुद्ध विद्रोह भी कर सकती है, यह बात भारतीय समाज के लिए, कम-से-कम उस समय जब यह नाटक लिखा गया था, कल्पना से परे थी। लेकिन प्रसादजी ने ध्रुवस्वामिनी के रूप में उसी विद्रोहिणी नारी को चित्रित किया है जो साहस के साथ अपने स्वतंत्र अस्तित्व की घोषणा करती है। वस्तुत: ध्रुवस्वामिनी के चरित्र का यह पहलू ही इस नाटक की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
ध्रुवस्वामिनी प्रसाद जी का अन्तिम नाटक है और उनके पूरे नाटक-साहित्य में एकदम अलग भी। इसमें न तो पहले नाटकों जैसी काव्यजनोचित भावुकता है और न ही संवादों की वैसी जटिलता। यह नाटक इस बात का प्रमाण है कि प्रसाद जी अपने अन्तिम समय में यथार्थवादी नाटक लेखन की तरफ मुड़ रहे थे। अपने जीवन्त संवादों और कसी ह...

Ratings and reviews

31 reviews
Anand Aditya
June 5, 2020
excilent book through this play jai Shankar prasad Ji reveals the position of women in our society those day so the flavour of this play is really appreciable.
6 people found this review helpful
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Eswarao M
April 4, 2024
ఓం లోxxx ఇది ఒక
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Prashanth Kumar Singh
December 2, 2019
Just loved it.
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About the author

जन्म : 30 जनवरी 1890, वाराणसी (उ.प्र.)। स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक। तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय। पिता देवीप्रसाद तम्बाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार 'सुँघनी साहू’ के नाम से प्रसिद्ध था। पिता के साथ बचपन में ही अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्राएँ कीं। छायावादी कविता के चार प्रमुख उन्नायकों में से एक। एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षों के छोटे-से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबन्ध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ। प्रमुख रचनाएँ : झरना, आँसू, लहर, कामायनी (काव्य); स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ, राज्यश्री (नाटक); छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इन्द्रजाल (कहानी-संग्रह); कंकाल, तितली, इरावती (उपन्यास)। 14 जनवरी, 1937 को वाराणसी में निधन।
जन्म : 30 जनवरी 1890, वाराणसी (उ.प्र.)। स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक। तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय। पिता देवीप्रसाद तम्बाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणस...

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