Dark Lipstick Shades

· Dark Lipstick Shades Vol 1 · Harsh Ranjan
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ॐ नमः शिवाय!

मेरी नयी पुस्तक, एक उपन्यास, डार्क लिपिस्टिक शेड्स के प्रथम भाग ‘डार्क’ को मैं लोगों को समर्पित करता हूँ। इसका अगला और आखिरी भाग ‘डार्कर’ लिखा जा रहा है। ये उपन्यास एक साधारण परिवार की लड़की के जीवन को बारीक नजर से देखते हुए लिखा गया है। कई बार हम सब कुछ समेटने के लिए आगे बढ़ते हैं और हमें पता चलता है कि हजारों खवाहिशें पाले हमारे मन के लिए हमारे पास हाथ केवल दो हैं। कुछ इसी भाव की ये कहानी है। ज़िंदगी में जगह कितनी है और ज़िंदगी से आशा कितनी है, ये बात तौलते हुए ये कहानी आगे बढ़ती है। आप इस पुस्तक को पढ़ें और मुझे इजाजत दें अगली किताब के लिए! तब तक खुश रहें और खुशियाँ बांटते रहें।

हर्ष रंजन

ॐ नमः शिवाय! मेरी नयी पुस्तक, एक उपन्यास, डार्क लिपिस्टिक शेड्स के प्रथम भाग ‘डार्क’ को मैं लोगों को समर्पित करता हूँ। इसका अगला और आखिरी भाग ‘डार्कर’ लिखा जा रहा है। ये उपन्यास एक साधारण परिवार की लड़की के जीवन को बारीक नजर से देखते हुए लिखा गया है। कई बार हम सब कुछ समेटने के लिए आगे बढ़ते हैं औ...

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About the author

हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।

लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।

ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।

कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।

ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।

कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!

हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजि...

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