Khattar Kaka

· Rajkamal Prakashan
20 reviews
Ebook
199
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About this ebook

खट्टर काका -- धर्म और इतिहास, पुराण के अस्वस्थ, लोकविरोधी प्रसंगों की दिलचस्प लेकिन कड़ी आलोचना प्रस्तुत करनेवाली, बहुमुखी प्रतिभा के धनी हरिमोहन झा की बहुप्रशंसित, उल्लेखनीय व्यंग्यकृति है-खट्टर काका! आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व खट्टर काक मैथिली भाषा में प्रकट हुए। जन्म लेते ही वह प्रसिद्ध हो उठे। मिथिला के घर-घर में उनका नाम चर्चित हो गया। जब उनकी कुछ विनोद-वार्त्ताएँ ‘कहानी’, ‘धर्मयुग’ आदि में छपीं तो हिंदी पाठकों को भी एक नया स्वाद मिला। गुजराती पाठकों ने भी उनकी चाशनी चखी। वह इतने बहुचर्चित और लोकप्रिय हुए कि दूर-दूर से चिट्ठियाँ आने लगीं-‘‘यह खट्टर काका कौन हैं कहाँ रहते हैं, उनकी और-और वार्त्ताएँ कहाँ मिलेंगी?’’ खट्टर काका मस्त जीव हैं। ठंडाई छानते हैं और आनंद-विनोद की वर्षा करते हैं। कबीरदास की तरह खट्टर काका उलटी गंगा बहा देते हैं। उनकी बातें एक-से-ए अनूठी, निराली और चौंकानेवाली होती हैं। जैसे-‘‘ब्रह्मचारी को वेद नहीं पढ़ना चाहिए। सती-सावित्री के उपाख्यान कन्याओं के हाथ नहीं देना चाहिए। पुराण बहू-बेटियों के योग्य नहीं हैं। दुर्गा की कथा स्त्रैणों की रची हुई है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को फुसला दिया है। दर्शनशास्त्र की रचना रस्सी देखकर हुई। असली ब्राह्मण विदेश में हैं। मूर्खता के प्रधान कारण हैं पंडितगण! दही-चिउड़-चीनी सांख्य के त्रिगुण हैं। स्वर्ग जाने से धर्म भ्रष्ट हो जाता है...!’’ खट्टर काका हँसी-हँसी में भी जो उलटा-सीधा बोल जाते हैं, उसे प्रमाणित किए बिना नहीं छोड़ते। श्रोता को अपने तर्क-जाल में उलझाकर उसे भूल-भुलैया में डाल देना उनका प्रिय कौतुक है। वह तसवीर का रुख तो यो पलट देते हैं कि सारे परिप्रेक्ष्य ही बदल जाते हैं। रामायण, महाभारत, गीता, वेद, वेदांत, पुराण-सभी उलट जाते हैं। बडे़-बड़े दिग्गज चरित्र बौने-विद्रूप बन जाते हैं। सिद्धान्तवादी सनकी सिद्ध होते हैं, और जीवमुक्त मिट्टी के लोंदे। देवतागण गोबर-गणेश प्रतीत होते हैं। धर्मराज अधर्मराज, और सत्यनारायण असत्यनारायण भासित होते हैं। आदर्शों के चित्र कार्टून जैसे दृष्टिगोचर होते हैं...। वह ऐसा चश्मा लगा देते हैं कि दुनिया ही उलटी नजर आती है। स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रकाशित हिंदी पाठकों के लिए एक अनुपम कृति-खट्टर काका।
खट्टर काका -- धर्म और इतिहास, पुराण के अस्वस्थ, लोकविरोधी प्रसंगों की दिलचस्प लेकिन कड़ी आलोचना प्रस्तुत करनेवाली, बहुमुखी प्रतिभा के धनी हरिमोहन झा की बहुप्रशंसित, उल्लेखनीय व्यंग्यकृति है-खट्टर काका! आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व खट्टर काक मैथिली भाषा में प्रकट हुए। जन्म लेते ही वह प्रसिद्ध हो उठे।...

Ratings and reviews

20 reviews
Narayan Lal
December 30, 2015
मैंने इसे buy करने का प्रयास किया लेकिन यह डाउनलोड भी नहीं हुआ और मेरे खाते से दो बार ₹ 51/- 51/- कट भी गए यानि ₹ 102/- मेरा पैसा कैसे वापस होगा?
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Gopala
May 24, 2015
Translation pasand nai aaya,,,,,, main KHATTAR KAKA ko maithili bhasha me padhana chahata tha,,,, Hindi me anuvaad kar iski sundarta ko khatam kar diya gaya
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PANKAJ KUMAR
September 17, 2015
It is written in such a way that make you aware about the truth without offending anyone.
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About the author

जन्म: सन् 1908। जन्मस्थान: कँुवर बाजितपुर, जिला वैशाली (बिहार)। सन् 1932 में पटना विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए.। इसके बाद पटना विश्वविद्यालय में ही दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और फिर विभागाध्यक्ष रहे। अपने बहुमुखी रचनात्मक अवदान से मैथिली साहित्य की श्री-वृद्धि करनेवाले विशिष्ट लेखक। भारतीय दर्शन और संस्कृति-काव्य साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान के रूप में विशेष ख्याति अर्जित की। धर्म, दर्शन और इतिहास, पुराण के अस्वस्थ, लोकविरोधी प्रसंगों की दिलचस्प लेकिन कड़ी आलोचना। इस सन्दर्भ में ‘खट्टर काका’ जैसी बहुचर्चित व्यंग्यकृति विशेष उल्लेखनीय। मूल मैथिली में करीब 20 पुस्तकें प्रकाशित। कुछ कहानियों का हिंदी, गुजराती और तमिल में अनुवाद। प्रमुख कृतियाँ: कन्यादान, द्विरागमन (उपन्यास); प्रणम्य देवता, रंगशाला (हास्य कथाएँ); खट्टर काका (व्यंग्य-कृति); चरचरी (विधा-विविधा)।
जन्म: सन् 1908। जन्मस्थान: कँुवर बाजितपुर, जिला वैशाली (बिहार)। सन् 1932 में पटना विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए.। इसके बाद पटना विश्वविद्यालय में ही दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और फिर विभागाध्यक्ष रहे। अपने बहुमुखी रचनात्मक अवदान से मैथिली साहित्य की श्री-वृद्धि करनेवाले विशिष्ट लेखक। भारती...

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