Hayvadan

· Radhakrishna Prakashan
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हयवदन स्त्री–पुरुष के आधे–अधूरेपन की त्रासदी और उनके उलझावपूर्ण संबंधों की अबूझ पहेली को देखने–दिखानेवाले नाटक तो समकालीन भारतीय रंग–परिदृश्य में और भी हैंय लेकिन जहाँ तक संपूर्णता की अंतहीन तलाश की असह्य यातनापूर्ण परिणति तथा बुद्धि (मन–आत्मा) और देह के सनातन महत्ता–संघर्ष के परिणाम का प्रश्न हैµगिरीश कारनाड का हयवदन, कई दृष्टियों से, निश्चय ही एक अनूठा नाट्य–प्रयोग है । इसमें पारंपरिक अथवा लोक नाट्य–रूपों के कई जीवंत रंग–तत्त्वों का विरल रचनात्मक इस्तेमाल किया गया है । बेताल पच्चीसी की सिरों और धड़ों की अदला–बदली की असमंजस–भरी प्राचीन कथा तथा टामस मान की ‘ट्रांसपोज्ड हैड्स’ की द्वंद्वपूर्ण आधुनिक कहानी पर आधारित यह नाटक जिस तरह देवदत्त, पद्मिनी और कपिल के प्रेम–त्रिकोण के समानान्तर हयवदन के उपाख्यान को गणेश–वंदना, भागवत, नट, अर्धपटी, अभिनटन, मुखौटे, गुड्डे–गुड़ियों और गीत–संगीत के माध्यम से एक लचीले रंग–शिल्प में पेश करता है, वह अपने–आपमें केवल कन्नड़ नाट्य–लेखन की ही नहीं, वरन् संपूर्ण आधुनिक भारतीय रंगकर्म की एक उल्लेखनीय उपलब्धि सिद्ध हुआ है । देवदत्त, कपिल, कपिलदेही देवदत्त तथा देवदत्तदेही कपिलµचार–चार पुरुषों के होते हुए भी अतृप्त एवं अधूरी और सुहागिन होकर भी अभागिन रह जानेवाली पद्मिनी की इस नाट्य–कथा में विलक्षण प्रसंग, रोचक चरित्र, जटिल संबंध तथा रोमांचक नाट्य–मोड़ों के साथ–साथ दर्शन, मनोविज्ञान, हिंसा, हास्य, प्रेम और रहस्य के इतने और ऐसे आयाम मौजूद हैं, जो प्रत्येक प्रतिभावान रंगकर्मी को हमेशा नई चुनौतियों से चमत्कृत करते हैं । यह नाटक मानव–जीवन के बुनियादी अंतर्विरोधों, संकटों और दबावों–तनावों को अत्यंत नाटकीय एवं कल्पनाशील रूप में अभिव्यक्त करता है । प्रासंगिक– आकर्षक कथ्य और सम्मोहक शिल्प की प्रभावशाली संगति ही हयवदन की वह मूल विशेषता है जो प्रत्येक सृजनधर्मी रंगकर्मी और बुद्धिजीवी पाठक को दुर्निवार शक्ति से अपनी ओर खींचती है । पिछले एक दशक में अनेक भाषाओं में कई निर्देशकों द्वारा सफलतापूर्वक अभिमंचित और राष्ट्रीय स्तर पर बहुप्रशंसित नाटक । 
हयवदन स्त्री–पुरुष के आधे–अधूरेपन की त्रासदी और उनके उलझावपूर्ण संबंधों की अबूझ पहेली को देखने–दिखानेवाले नाटक तो समकालीन भारतीय रंग–परिदृश्य में और भी हैंय लेकिन जहाँ तक संपूर्णता की अंतहीन तलाश की असह्य यातनापूर्ण परिणति तथा बुद्धि (मन–आत्मा) और देह के सनातन महत्ता–संघर्ष के परिणाम का प्रश्न है...

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December 20, 2015
hai
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गिरीश कारनाड

1938, माथेरान, महाराष्ट्र में जन्मे गिरीश कारनाड की मातृभाषा कन्नड़ है। गणित की सर्वोच्च परीक्षा में सफल होकर ‘होड्स स्कॉलर’ के रूप में ऑक्सफोर्ड गए।

1963 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मद्रास में नौकरी। 1970 में ‘भाषा फेलोशिप’, नौकरी से त्याग-पत्र और स्वतंत्र लेखन की शुरुआत। पहला नाटक ययाति 1968 में छपा और चर्चा का विषय बना। तुगलक के लेखन-प्रकाशन और बहुभाषी अनुवादों-प्रदर्शनों से राष्ट्रीय स्तर के नाटककार के रूप में प्रतिष्ठा। 1971 में हयवदन का प्रकाशन, अभिमंचन। 2015 में बलि, 2017 में शादी का एलबम, बिखरे बिम्ब और पुष्प का प्रकाशन। पूना के फिल्म-संस्थान में प्रधानाचार्य, त्याग-पत्र और इस नए सशक्त अभिव्यक्ति-माध्यम के प्रति दिलचस्पी। सन् 1988 से कुछ वर्ष पहले तक संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली के अध्यक्ष रहे।

संस्कार, वंशवृक्ष, काड़ू, अंकुर, निशान्त, स्वामी और गोधूलि जैसी राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत एवं प्रशंसित फिल्मों में अभिनय-निर्देशन। मृच्छकटिक पर आधारित फिल्मालेख, उत्सव के लेखक-निर्देशक तथा एक लोकप्रिय दूरदर्शन धारावाहिक के महत्त्वपूर्ण अभिनेता के रूप में बहुचर्चित।

सम्मान : तुगलक के लिए संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, हयवदन के लिए कमलादेवी चट्टोपाध्याय पुरस्कार, रक्त कल्याण के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा साहित्य में समग्र योगदान के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन।

 

गिरीश कारनाड 1938, माथेरान, महाराष्ट्र में जन्मे गिरीश कारनाड की मातृभाषा कन्नड़ है। गणित की सर्वोच्च परीक्षा में सफल होकर ‘होड्स स्कॉलर’ के रूप में ऑक्सफोर्ड गए। 1963 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मद्रास में नौकरी। 1970 में ‘भाषा फेलोशिप’, नौकरी से त्याग-पत्र और स्वतंत्र लेखन की शुरुआत। पहला ...

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