बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है। उस बरस को हम आज में भी घसीट लाए हैं। न ही बात है सिर्फ़ हमारे शहर की। ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’—सुलगता, खदकता—‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का। एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूँढ़ना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल। पुरानी धारणाएँ फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक़्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से। न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक। वे संगीनें जो दूर हैं उधर, उन पर मुड़ीं, वे हम पर भी न मुड़ जाएँ, वह धूल-धुआँ जो उधर भरा है, इधर भी न मुड़ आए।
अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं—दूर, उस पार, उन लोगों में—पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके ख़ुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती। दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहाँ ख़ून बह रहा है। सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे।
अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश ही इस गाथा का मूल। ख़ुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज़ पर धर देने जैसा। अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है। यही शुरुआत एक ज़बरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलि श्री ने ‘हमारा शहर उस बरस’ में की है। जान न पाने की बढ़ती बेबसी के बीच जानने की तरफ़ ले जाते ह जाते हुए !
गीतांजलि श्री
जन्म : 12 जून 1957
शिक्षा: इतिहास में एम. ए. और पी-एच.डी.
अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘रेत समाधि’ के लिए 2022 के ‘अन्तरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार’ से सम्मानित लेखक गीतांजलि श्री के पाँच उपन्यास–‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘खाली जगह’, ‘रेत-समाधि’; पाँच कहानी-संग्रह–‘अनुगूँज’, ‘वैराग्य’, ‘मार्च, माँ और साकुरा’, ‘यहाँ हाथी रहते थे’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ और एक शोध-ग्रन्थ ‘बिटवीन टू वर्ल्ड्स : ऐन इंटेलेक्चुअल बायोग्राफ़ी ऑफ़ प्रेमचन्द’ छप चुके हैं। इनकी रचनाओं के अनुवाद कई भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में हुए हैं। साहित्येतर लेखन ये हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में करती हैं। थियेटर के लिए भी लिखती हैं। इन्हें ‘वनमाली राष्ट्रीय पुरस्कार’, ‘कृष्ण बलदेव वैद पुरस्कार’, ‘कथा यू.के. सम्मान’, ‘हिन्दी अकादमी साहित्यकार सम्मान’ और ‘द्विजदेव सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है। ये रेज़िडेंसी और फ़ेलोशिप के लिए स्कॉटलैंड, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, आइसलैंड, फ्रांस, कोरिया, जापान इत्यादि देशों में गई हैं। इनके उपन्यास ‘रेत समाधि’ को 2021 के Emile Guimet Prize की शॉर्ट लिस्ट में भी शामिल किया गया था।
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