Chandrakanta

· Radhakrishna Prakashan
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E-book
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À propos de cet e-book

व्यक्तिगत और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ‘चन्दकान्ता’ वर्ग के उपन्यासों को देखें तो कथानक के कुछ और ही अर्थ-आयाम सामने आने लगते हैं...सारा उपन्यास दौलत को छिपाने या छिपी दौलत को सही और अधिकारी हाथों सौंपने और हथिया लेने के संघर्ष की महागाथा बनकर सामने आने लगता है। तिलिस्म की परिकल्पना भी इसी दौलत के लिए की गई है और उधर सारी ऐयारी या धोखाधड़ी भी इसी के लिए है...दारोगा, जैपालसिंह, मायारानी और यहाँ तक कि भूतनाथ भी इसीलिए खलनायक हैं, और बीरेन्द्रसिंह, इन्द्रजीत-आनन्दसिंह या उनके साथी इसी के लिए नायक। मोटे रूप में उपन्यास के दो खलनायक हैं - शिवदत्त और दारोगा...शिवदत्त गद्दी से उतारा हुआ राजा है, इसलिए बीते युग के सपने, राज्य वापस लेने के उसके सारे प्रयास, जोड़-तोड़ या साधन इकट्ठे करना या इस सबके लिए धन-दौलत की आकांक्षा बहुत अस्वाभाविक नहीं है। मायारानी, दारोगा और जैपालसिंह के षड्यन्त्रों के शिकार राजा गोपालसिंह भी तो अपनी छिनी हुई गद्दी के लिए बीरेन्द्रसिंह, इन्द्रदेव के साथ मिलकर यही करते हैं। ऊपर ऐयारी, भीतर तिलिस्म। दुहरे धरातल पर चलनेवाली कहानी। ऊपरी चतुराई के समय का सामना करने की कोशिश और भीतर कहीं कुछ बेहद ही कीमती छिपाए होने का सन्तोष। ऊपरी मनोरंजन के पीछे भारतीय अस्मिता के होने और खोज निकालने का विश्वास।
व्यक्तिगत और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ‘चन्दकान्ता’ वर्ग के उपन्यासों को देखें तो कथानक के कुछ और ही अर्थ-आयाम सामने आने लगते हैं...सारा उपन्यास दौलत को छिपाने या छिपी दौलत को सही और अधिकारी हाथों सौंपने और हथिया लेने के संघर्ष की महागाथा बनकर सामने आने लगता है। तिलिस्म की परिकल्पना भी इसी दौलत के...

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