BANDHARA

· MEHTA PUBLISHING HOUSE
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"मग कोन कोन हैत घरात?'' "घरात शेतीबिती असंल?'' "तुमचा देवाधर्मावर इस्वास हाय का न्हाई?'' "बगा ही अंगडी टोपडी. अहो, नवसासायासायनं झालाय मग हौस नको करायला?'' "घ्या, डिंकाचा लाडू घ्या. आईनं मुद्दाम सुनंसाठी दिल्यात.'' "थांबा हं, तुमाला एक वस्तू अशी दावतो कशी, अगदी बगण्यालायक!'' एक मोठं गोल फिरणारं प्लॅस्टिकचे हत्ती, घोडे असलेलं खेळणं काढलं. खेळणं फिरत होतं, आणि ते फिरवून दाखवणार्याच्या डोळ्यांत वात्सल्याचा आनंद उसळत होता. तो पाहून त्या सहप्रवाशाचे डोळे तरारले. आपल्या खिशातला रुमाल काढून तो आपले डोळे टिपत म्हणाला, "किती हौशी आहात हो?''..... अडीच तीन तासांचा त्याचा सोबती हे सारं थक्क होऊन बघत होता. इतका वेळ बाड बाड करणारी त्याची जीभ लुळी झाली. हातातलं ओझं पेलवेना झालं. गेलं माणूस कुणाचं कोण, पण त्याचा गळा दाटून आला. हुंदके अनावर होऊन आवर कसा घालावा हे कळेना झालं. तो तिथंच थोडा वेळ उभा राहिला. कढ जाऊ दिला आणि जड पावलं उचलत पुढे निघाला. बंधारा फुटावा तसं घडलं.
"मग कोन कोन हैत घरात?'' "घरात शेतीबिती असंल?'' "तुमचा देवाधर्मावर इस्वास हाय का न्हाई?'' "बगा ही अंगडी टोपडी. अहो, नवसासायासायनं झालाय मग हौस नको करायला?'' "घ्या, डिंकाचा लाडू घ्या. आईनं मुद्दाम सुनंसाठी दिल्यात.'' "थांबा हं, तुमाला एक वस्तू अशी दावतो कशी, अगदी बगण्यालायक!'' एक मोठं गोल फिरणारं प...

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