प्रेमचंद के “वरदान” का मूल कथ्य सुवामा की उस तपस्या से आरंभ होता है, जिसमें वह देवी अष्टभुजा से “धन, बल, विद्या” नहीं, बल्कि देश-उपकारी सपूत का वर मांगती है। उसे प्रतापचन्द्र नाम का तेजस्वी पुत्र मिलता है। मुंशी शालिग्राम, प्रताप के पिता, वैराग्य-प्रवृत्त, उदार और दानशील मनुष्य हैं, परंतु प्रयाग कुम्भ-यात्रा में रहस्यमय रूप से लापता हो जाते हैं। अत्यधिक ऋण और सामाजिक दबाव के बीच सुवामा किसी कृपा-धन या आश्रय को स्वीकार नहीं करती; आत्मसम्मान और सत्यनिष्ठा के बल पर संपत्ति नीलाम कर सभी ऋण चुका देती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह प्रताप का पालन दृढ़ता और त्याग से करती है। पड़ोसी संजीवनलाल के परिवार से प्रताप और उनकी पुत्री वृजरानी में स्नेहपूर्ण मित्रता विकसित होती है। उपन्यास में मातृत्व, आत्मसम्मान, त्याग, बाल-मन की निर्मलता और राष्ट्र-सेवा की प्रेरणा प्रमुख रूप से उभरती है।