प्रेमचंद के उपन्यास “कायाकल्प” में सामाजिक सुधार, मानवीय सेवा और आदर्शवाद केंद्रीय विषय हैं। कथा आरंभ होती है सूर्यग्रहण के समय त्रिवेणी पर उमड़ी अपार भीड़ और भगदड़ में एक धनी परिवार की छोटी बच्ची के खो जाने से। सेवा–समितियों के युवक यशोदानंदन और महमूद उसे बचाकर खोज-बीन करते हैं, किंतु उसके माता–पिता का पता न चलने पर उसे अनाथालय में रख दिया जाता है। दूसरी ओर बनारस के मुंशी वज्रधरसिंह का मेधावी पर स्वतंत्रचेतस पुत्र चक्रधर नौकरी के पारंपरिक मार्ग को अस्वीकार कर सेवा–कार्य में जीवन सार्थकता खोजता है। पिता के आग्रह पर वह सीमित समय देने वाली एक शिक्षक की नौकरी स्वीकार करता है। उपन्यास आदर्शवाद, कर्तव्य, सामाजिक विषमता, मानवीय करुणा और सेवा–भाव से मनुष्य के आंतरिक कायाकल्प की प्रक्रिया को चित्रित करता है।